धारा( लघुकथा-संग्रह): वसुधा गाडगिल, अंतरा करवड़े; प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3,बी-4, कृष्णा नगर, लखनऊ – 226023, मूल्य : 180 रुपये,पेज : 121

‘धारा’ है तभी तो किनारे बने है। दो तटों के बीच ही धारा की प्रवहमानता अनवरत रहा करती है। पाँच तत्वों की प्रधानता से ही सृष्टि का लेखा-जोखा विद्यमान है। ये पाँच तत्त्व है, – भूमि, आकाश, हवा, पानी और अग्नि। यही पाँच तत्व पंचमहाभूत की संज्ञा से अभिहित होकर भारतीय दर्शन में सभी पदार्थो के मूल माने गए हैं।
लघुकथाकारद्वय वसुधा गाडगिल और अन्तरा करवड़े़ ने बिना किसी विरोधाभास के पारस्परिक एवं सामंजस्य भाव से पंचभूत में से एक तत्व यानी जल तत्व आधारित साझा लघुकथा संग्रह ‘धारा’शीर्षक से प्रस्तुत किया है जो लघुकथाकारद्वय की लघुकथा विषयक रचनात्मकता के उद्याम (बंधनहीन) रूप के साथ विरचित हुआ है।
प्रस्तुत धारा ‘लघुकथा संग्रह’ में लघुकथाकारद्वय वसुधा गाडगिल और अन्तरा करवड़े के मध्य धारा अथवा जल से अनुस्यूत पचास उभयनिष्ठ शीर्षकों का चयन आपसी सहमति के आधार पर किया जाकर तय शीर्षकों पर बिना किसी प्रतिस्पर्धा का संधान किए भिन्न-भिन्न कथ्यों का वैचारिकता के आधार पर चयन कर सारगर्भित लघुकथाओं का अभिलेखन किया है। अर्थात ‘धारा’ शीर्षक लघुकथा संग्रह को संयोजित करने वाले विभिन्न पचास शीर्षक ही ऐसे उपकरण अर्थात् औजार या साधन कहे जा सकते हैं जिनसे ‘धारा’लघुकथा संग्रह का रूप सँवरकर आया है। ये विभिन्न शीर्षक ‘धारा’ लघुकथा संग्रह के अंग-उपांग की तरह आये हैं । जिनमें कतिपय महत्वपूर्ण शीर्षक हैं, नदी, झरना फुहार, बाढ़, सागर, संगम, धारा, सोता, नद, बूँदे, निर्झर, सरिता, आँसू, रिसाव, उफान, प्रवाह, लहर, नहर और झील इत्यादि। यह सभी शीर्षक जल की ओर या उसके चारों ओर ‘आवर्तन’ तथा ‘परावर्तन रूप में घूमते मिलते हैं। लघुकथाकार द्वय ने जल विषयक अपने द्वारा विश्लेषित किए गए उक्त शीर्षकों को विवेचित कर इन शीर्षकों के आश्रय से बड़ी योग्यता और शालीनता के साथ अपने-अपने हिस्से से लघुकथाएँ कही हैं, जिनमें जल की महत्ता, जलसंरक्षण, जलप्रदूषण जैसे विचारों का दोहन तो किया ही है बरअक्स इनके समकालीन जन-जीवन में झाँककर अपनी-अपनी लघुकथाओं में सामायिक सन्दर्भो को अद्घाटित करने वाले प्रासंगिकता के अनेक कैनवास रचे भी है।
प्रस्तुत लघुकथा संग्रह ‘धारा’ में भिन्न-भिन्न प्रकार के मगर विविध होकर भी एक जैसे शीर्षक पर लघुकथाकार द्वय ने अपनी पृथक-पृथक लघुकथाएँ निष्पादित की है। आलोच्य दृष्टि से सर्वप्रथम एक जैसे शीर्षक पर डॉ.वसुधा गाडगिल की कतिपय लघुकथाओं पर विचार करें तो उनकी लघुकथाओं में व्याप्त कथ्य की दृष्टि से विभिन्न बारीकियाँ कौतुहल रचने वाली दिखाई पड़ती है। मसलन यदि वसुधा गाडगिल की लघुकथा ‘नदी’ पर दृष्टिपात करे तो लघुकथा में नदी विशाल पर्वतों का दर्प चूर-चूर करते हुए जीवनदायिनी की तरह बहते हुए अतृप्त जीवों की प्यास मिटाती हुई अत्यन्त विनीत भाव से बहती रहती है। वसुधा जी की लघुकथा ‘झरना’ विदेश में बसे पुत्र की उपेक्षा से उपेक्षित हुई माँ की कारूणिक स्थिति का ब्यौरा देती हुई दर्शाती है कि कैसे माँ पुस्तकों को मित्र बनाकर अपना एकाकी मगर उदास जीवन को प्रसन्नता के क्षणेां में ढाल लेती है। ‘सरोवर’ नामक लघुकथा में मनुष्यों द्वारा प्रदूषित ‘सरोवर’ को स्वच्छ बनाने और उसके तट पर जीर्ण प्रायः खड़े पौधों को नया जीवन देने में मानवेतर जगत् अपनी कल्याणकारी भूमिका निभाते हुए मानव जाति को उन्नत पर्याव्रण बनाये रखने के सन्देश सुनाता मिलता हैं। लघुकथा ‘कलकल’ में पिता की भिन्न-भिन्न भाषा क्षेत्रों में नौकरी के चलते हुए पुत्री का भाषा विषयक सम्प्रेषण बिगड़ जाने की परवाह तो जरूर की गई है, लेकिन प्रस्थितिवश नानाविध भाषाओं का प्रचुर ज्ञान प्राप्त कर चुकने के बाद पुत्री अन्तर्राष्ट्रीय जगत में श्रेष्ठ अनुवादक होने की प्रशस्ति प्राप्त कर लेती है। वसुधा गाडगिल की लघुकथा ‘संगम’ भारतवर्ष में पौराणिक काल से चले आ रहे नदी में दीपदान करने के सांस्कृतिक महत्त्व को दर्शाती हुई एक अभारतीय युवती के मन में भारत में पुरातन काल से प्रचलित आध्यात्मिक सम्मोहन को जगा देती है।
‘धारा’ लघुकथा संग्रह के द्वितीय भाग की खेवणहार लघुकथाकार अन्तरा करवड़े है ,जो स्वयं भी लघुकथाकार वसुंधरा गाडगिल की तरह उनकी लघुकथाओं पर चढ़ाए हुए शीर्षकों की अनुगामी होकर उन्हीं घोषित शीर्षकों की थाप पर बड़े ही रोचक और स्मृहणीय ढंग से अपनी लघुकथाओं को तरंगायित करती मिलती है। अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘नदी’ पावन सलिला पर आस्थावान् दम्पतीकी उस आन्तरिक विश्वसनीयता को प्रकट करती है जो दाम्पत्य जीवन के उत्तरार्ध को भी सुचारू बनाये रखने के निमित्त वरदायी नदी से आशीष मांगती है। अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘झरना’ अनाथाश्रम में पहुँची ऐसी महिला की संवेदना का गीत लिखती है जो खुद भी कभी अनाथालय से किसी धनाढ्य द्वारा ग्रहीत की हुई होती है और जो अनाथालय पहुँच कर अनाथ, कन्याओं के मध्य अपनेपन से भरी भाषा में सबका मन मोह लेती है। अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘सरोवर’ सड़क हादसे से शिकार ग्रस्त ऐसी जीवट एथलीट की अनुकरणीय दास्तान को व्यक्त करती है, जिसके दृढ़ व्यक्तित्व में अवगाहन (स्नान) करने वाली अन्य कोई भी विकलांग युवती अपने ध्येय का हिमालय चढ़ सकने में प्रेरणा का विजेता भाव प्राप्त कर सकती है। अन्तरा करवड़े की लघुकथा ‘कल-कल’ अपने पार्श्व में संयुक्त परिवारों के टूटन की दुरवस्था को रखते हुए परिवार में सास के बहु के प्रति ममतापूर्ण सम्मान को परिवार में उठने वाले तमाम विरोधों के बावजूद सर्वोपरि भाव से प्रदर्शित करती है। ससुराल में बहु के लिए मायकानुमा घर-आँगन का द्वार खोलना ही इस लघुकथा का अनुकरणीय सौहार्द भाव है। लघुकथा ‘संगम’ धर्म-परिवर्तन की ऐसी जटिलता पर केन्द्रित है जिसमें विदेश में बसे पुत्र अपने पिता के सामने अपने धर्म परिवर्तन करने की जिज्ञासा रखता है, जिसके स्वीकृति के जवाब में पिता अपने पुत्र से छह महीने का समय माँगते हैं। इन छह महीनों के अन्तराल में भारत भूमि पर निवास करते हुए पिता भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सिलसिलेवार अध्ययन करते हैं और उसी के आधार पर भारतीय जीवन की रसानुभूति का रसायन बेटे के कण्ठ में उतारते हैं। जिस अमृत को गटककर बेटा धर्म परिवर्तन की इच्छा को विसर्जित कर देता है।
लघुकथा की छवि को कलात्मक प्रभाव में बदलने के लिए भाषा का ‘प्रिस्मा’ (प्रिज्म) एक जरूरी उपकरण है। लघुकथाकारद्वय ने अपनी लघुकथाओं की रचना-प्रक्रिया के बीचोंबीच ऐसे ही ‘प्रिज्म’ को खड़ा किया है। जिससे भाषा का अर्थवान चेहरा साफ सुथरा दिखाई दे।
लब्बोलुआब यह कि ‘धारा’ लघुकथा संग्रह को नियोजित ढंग से पूर्ण बनाने में वसुधा गाडगिल व अन्तरा करवड़े ने अपने-अपने छोर से चलकर ‘‘जल’’ तत्व के आश्रय से अपनी लघुकथाओं की जो मंजिल गढ़ी है, वही मंजिल इन लघुकथाकारद्वय के लिए आगे की यात्रा का संक्रमण बिन्दु बनकर उनके जल के अलावा शेष आकाश, धरती, पवन और अग्नि जैसे जटिल मगर लोकहितकारी विषयों पर लघुकथाएँ लिखने का लश्कर खड़ा करेंगी। मेरा विश्वास है कि पंचभूत के भैरव मिश्रण से सम्पृक्त होकर संकल्पबद्ध लघुकथाकारद्वय भविष्य में वांछित शेष चार तत्वों पर अपनी लघुकथाओं का वांगमय इसी अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ सम्पादित कर लघुकथा जगत को अपने महत प्रदेय से लाभान्वित बनायेंगी।
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डॉ. पुरुषोत्तम दुबे – शशीपुष्प – 74 जे/ए स्कीम नं. 71, इन्दौर 452009 (म.प्र.) मो. 9329581414 Mail ID : dubeypurushottam24@gmail.com