सितम्बर 2026

देशदृष्टि- कुदृष्टि     Posted: June 1, 2026

उनका नाम देश के चर्चित कथाकारों में शुमार था। साहित्यिक कार्यक्रमों में सामाजिक सरोकारों और जीवन मूल्यों पर उनके व्याख्यानों पर खूब तालियाँ बजती थीं। उस पर वे एक बड़े समाचार पत्र समूह की साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे। साहित्यकारों का मजमा लगा होता था उनके आफिस में। दरबार में रचना प्रकाशन का हर आकांक्षी उनका गुणगान करते नहीं थकता था। नवोदित लेखिकाओं से तो वे हमेशा ही घिरे रहते थे। स्त्री रचनाकारों पर उनकी खास कृपा रहती थी। वे बाकायदा पत्र लिखकर उनकी रचनाओं का संवर्धन भी करते थे, देश की राजधानी से सैकड़ों किमी दर एक छोटे से शहर में रहने वाला शेखर उनकी रचनाओं व प्रतिष्ठा से गहरे तक प्रभावित था। पहली बार उसने नगरपालिका की लाढ़ब्रेरी में उनकी पत्रिका में उनका संपादकीय व कविता पढ़ी थी। संपादक के आदर्श विचारों ने उसे गहरे तक प्रभावित किया। शेखर बीए का छात्र था। साहित्य में उसकी गहरी रुचि थी। वह अक्सर सोचा करता कि दिल्‍ली जाकर उस संपादक से पिलूं उसके मन में उनकी आदर्श छवि थी।

अंतत: शेखर ने मन बनाया कि वह दिल्‍ली जाकर संपादक से मिलेगा। साथ ही अपनी कुछ कविताएं भी ले जाएगा। दरअसल बचपन में मां शरि की उसके पिता की प्राण रक्षा करते  वक्‍त एक घातक हलले में जान चली गई थी। बेहद संवेदनशील शेखर मां को खोने का गम कभी भुला न पाया। पिता सततियों को नहीं की। शेखर ने अपनी मां को आदर देने और उनकी को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपने नाम के साथ उनका नाम अपने उपनाम के रुप में ‘शशि’ लगा लिया।

एक दिन कॉलेज से छुट्टी लेकर शेखर दिल्‍ली निकल गया। कुछ सफर मेट्रो से तय किया, बाकी टेम्पो से व पैदल। वह ठीक ग्यारह बजे पत्रिका के दफ्तर जा पहुँचा। बाद में पता चला कि अखबार व पत्रिका के संपादकगण तीन बजे के बाद आते हैं। उसके सामने प्रतीक्षा करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

ठीक तीन बजे पत्रिका के कार्यालय में हलचल सी हुईं। चपरासी सक्रिय हुआ। तभी एक मोटा सा व्यक्ति हाथ में बैग लिए सामने से आता दिखा और संपादक के कमरे में प्रवेश कर गया। वहाँ कुछ अन्य लोग भी उनकी प्रतीक्षा में थे। शेखर को अपनी बारी का इंतजार करते आधा घंटा और हो गया। जब उसका पघैर्य जवाब दे गया तो उसने एक स्लिप में अपने शहर के उल्लेख के साथ शशि नाम लिखकर चपरासी के जरिये संपादक तक भेजा। अंदर से तुरंत बेल बजी। संपादक जोर से बोला कि शशि को अंदर भेजो। चपरासी बाहर आया और शेखर को अंदर जाने को कहा। जैसे ही वह अंदर पहुंचा, संपादक जोर से बोला-आपको किसने बुलाया, मैंने तो शशि को बुलाया था. .!

शेखर बोला, “सर, मेरा उपनाम ही शशि है!’’

संपादक गुर्राया, “कैसे-कैसे नाम रख लेते हैं लोग।” उसने दो चार बातें करके शेखर को टरका दिया। संपादक की रसिकता से आहत शेखर मन मसोसकर रह गया। वह अपने शहर जाने वाली बस तलाशने के लिए पत्रिका के कार्यालय से बाहर आ गया।

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