जून 2026

भाषान्तरदिखावा/ अटब्बर     Posted: August 1, 2024

ब्रज- अनुवाद: रश्मि विभा त्रिपाठी

एकु कॉफी हाऊस के बाहिर बरामदे बीच लागी मेज कुर्सिन पै बिराजे कछू ज्वान लरिका कॉफी पीबे के सन सन कछू ऊँचे सुरनि काऊ विषय पै बहस ऊ करि रए हुते। अरु बाहिर मुख्य मारग पै एकु जाचक हाथ कटोरा लीन्हैं भीख की साधि तैं ठाड़ौ हुतो। बिन ज्वान लरिकन बीच तैं एकु ज्वान लरिका, जु कुर्ता- पजम्मा पहिरैं हुतो, एकु सफारी सूट पहिरैं ज्वान लरिका तैं कहिबे लाग्यौ, ‘‘तुव पइसा बारे मान्स! निधनीनि कौं चितइबौ ऊ नाहिं भावत! जबहिं कि जिनहीं निधनीनि के मारैं तुव सिग जने जा ठाठ-बाट तैं रहति औ। नाहिं तौ…!’’

‘‘देखौ! तुव अनुआँ अनुमानि रए। बात इमि नाहिं हति।’’

‘‘तौ, बहोरि!’’

‘‘धनाढ्यता निधनताई तौ मानुष की आपु ओढ़ी बिछाई भई ऐ। न हौं पइसा बारौ हौं अरु नाहिं मोहि निधनीनि तैं काहू बिधि कोऊ अलिच्छ ऐ।’’

‘‘जु पै साँचेहुँ इमि बात ऐ, धौं अगारी भीख माँगि रए जाचक कौं जाइ गरे लगाइ दिखाउ।’’ 

‘‘हौं बाकौं कछू रुपय्या भीख तौ दै सकत हौं, पै वा मलिच्छी जाचक कौं हौं गरे काऊ भाइ पै नाहिं लगाइ सकतु। तुव, जी आवै धौं जाइ वासौं गरे मिलहु कै…।’’

इयतौ सुनत ई बु कुर्ता पहिरैं ज्वान लरिका लमकि बा जाचक तन बढ़ि गयौ। अरु जातई वाहि अपुनी बँहियनि मैं भरि गरे लगाइ लियौ।

जा बिधि ज्वान लरिका कौं अपुने गरे लगत चितइ आगैं तौ जाचक कछू अरबरानौ, पै बहोरि कछू सम्हरत भएँ बरनौ- ‘‘बाबू पेट गरे लगाइबे तैं नाहिं, रोटी तैं भरतु ऐ। अरु रोटी के काजैं पइसा आवस ऐ।’’

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine