वाइब्रेट होते मोबाइल की स्क्रीन पर…बाबू जी कॉलिंग? कई सवाल। बाबू जी इन दिनों छोटे बेटे-बहू के साथ थे फिर ‘फोन क्यों कर रहे हैं?’ इस युग में बच्चे माता पिता के साथ कहां रहते हैं, बच्चों के साथ मां-बाप! बाबू जी एकाकी। कभी-कभी पूर्व दीप्ति में चले जाते। बस्स बीस-बाइस दिनों में ही कैंसर के आघात ने उन्हें अकेला कर दिया था। मां के अचानक इस तरह चले जाने से गांव का घर संग्रहालय हो गया। दो बेटे। बाबूजी के लिए सब कुछ ध्यान रखने वाले। बाबू जी का आना जाना फ्लाइट से।
बेटे ने कॉल पिक किया। ‘हां जी बाबू जी।’
‘बड़ी देर हो गई? बहू को क्या हुआ है? कुछ बताया भी नहीं। किस अस्पताल में ले गये हो?’
‘बस थोड़ी देर में आ रहे हैं। हाथ में थोड़ा दर्द है।’
महीने भर पहले ही बहू प्रभा को बायें फ्रोजेन सोल्डर में फिजियोथेरेपी से आराम मिला था। डॉक्टर ने उस हाथ से काम करने को मना किया था। इधर प्रभा की लापरवाही से दर्द फिर उभर आया था।
बाबू जी बाहर ही बैठे राह देख रहे थे। बहू बेटे घर पहुंचे तो चिंता दूर हुई। कम बोलने वाले बाबू जी। बेटे ने बताया कि डॉक्टर ने दवा दिया है। दोपहर के खाने का समय हो रहा था। बहू ने हाथ मुंह धुला और जल्दी जल्दी किचन में।
‘मुझे भूख नहीं है, पेट में हल्का दर्द है। खाना न बनाना।’ बाबू जी ने बहू को संबोधित किया।
प्रभा ने स्वीकृति में सिर हिलाया परंतु कुकर में फटाफट दाल चावल चढ़ा दिया। स्कूल से आते ही पोते ने बाबा का हाथ पकड़ कर खाने की जिद की। मना न कर सके। बाबू जी कैसे कहते कि बहू के हाथ दर्द से उन्हें भूख नहीं थी।
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