‘तत्पश्चात्’ के सम्पादक श्री सतीशराज पुष्करणा लघुकथा-जगत् में एक प्रयोगधर्थी के तौर पर प्रसिद्ध हैं। इन्होंने अभी तक ‘वर्तमान के झरोखे में’, ‘बिखरे संदर्भ’, ‘लघुकथा : बहस के चौराहे पर’, ‘आज के प्रतिविम्ब’, ‘काशें’, ‘प्रत्यक्ष’ और अब ‘तत्पश्चात्’ आदि चर्चित एवम् उल्लेखनीय पुस्तकें लघुकथा को समर्पित की हैं। इनकी प्रत्येक पुस्तक में कुछ-न-कुछ नयापन अवश्य ही रहा है। लघुकथा के लिए सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में ‘लघुकथा : बहस के चौराहे पर’ को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता ।
प्रस्तुत ग्रन्थ ‘तत्पश्चात्’ में कई बातें नई एवं प्रयोग के तौर पर प्रस्तुत की गई हैं। सबसे पहली बात तो यह कि इस पुस्तक के माध्यम से निशान्तर के रूप में लघुकथा को विधिवत् एक समीक्षक मिल रहा है, जो यदि लघुकथा एवं इसके पाठकों में पैठकर इसकी दूरी को सहजता से तय कर सके, तो यह उसके एवं लघुकथा के लिए एक उपलब्धि होगी; किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है। इसके लिए निशान्तर में लघुकथा के प्रति समर्पणभाव का होना अत्यावश्यक है । ‘तत्पश्चात्’ की दूसरी विशेषता है कि इस पुस्तक के माध्यम से श्री पुष्करणा ने कथाकारों का उनकी लघुकथाओं एवं वक्तव्यों के साथ समीक्षक, पाठक एवं समीक्षक-दर-समीक्षक को उनकी स्पष्ट एवं बेबाक विचार-धाराओं के साथ एक-दूसरे के रू-ब-रू कर दिया है। अतः बहुत ही साफ-साफ और अतुलनीय प्रयास है यह – ‘तत्पश्चात्’। इसके अतिरिक्त ‘तत्पश्चात्’, के लिए एक बात बेबाक रूप से कही जा सकती है कि आठवें एवं नवें दशक में लघुकथा स्थिति की बानगी ज्ञात हो सकती है, तिस पर हर लेखक की रचना पर युवा समीक्षक द्वारा की गई टिप्पणी से पाठक उन लघुकथाओं को पढ़ने के लिए विवश भी हो सकता है । ‘तत्पश्चात्’ का यह कार्य लघुकथा के समीक्षात्मक ढंग के कार्य करने वाले अन्य संपादकों के लिए भी एक अनुकरणीय कदम होगा ।
‘तत्पश्चात्’, की विशेषता इस बात में भी है कि अलग-अलग समीक्षक के विचारों से इतर वर्त्तमान लघुकथा की स्थिति का जायजा अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत करने को बाध्य हो सकेंगे; क्योंकि यह संकलन विभिन्न विद्वानों को प्रोवोक (उत्प्रेरित) करने में सक्षम है।
युवा समीक्षक ने काफी गहराई से रचनाओं को पढ़कर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी दी है; पर समीक्षक का यह शास्त्रीय 2-प्रस्तुतीकरण एकेडमिक-सा है और संभव है इस पुस्तक में जो लेख आयेंगे, उनमें इतना तो तय है कि रचनाकारों के बारे में मोटे तौर पर जानकारी मिल जाने पर लघुकथात्मक रचनाओं के बारे में हर विद्वान अपने ही ढंग से लिखेगा। अतः युवा लेखक को अभी एकेडमिक शास्त्रीय ढंग से बचना होगा। हो सकता है लघुकथा की आलोचना को प्रतिस्थापित करने में निशांतर का यह समर्पित प्रयास रहा हो; परन्तु उसे सर्वप्रथम लघुकथा की मूलभूत विशेषताओं और शिल्प के संबंध में अब तक प्राप्त सामग्री को हृदयंगम करके लघुकथा की टेकनीक और आलोचना से सम्बन्धित अपना दृष्टिकोण प्रकाशित कराना था, तत्पश्चात् ‘तत्पश्चात्’ में रचनाओं की आलोचना करता, तो यह लघुकथा आलोचना के लिए एक नए कदम का काम कर सकती थी।
लगता है निशांतर का सारा जोर रचनाकारों के व्यक्तित्व को रचनाओं के बहाने उद्घाटित करने का रहा हो। इस बात की पुष्टि रचनाकारों की रचनाओं पर दी गई टिप्पणियों से स्पष्ट तौर पर हो जाती है।
निशांतर की रचना और रचनाकार पर टिप्पणियाँ यह एहसास कराती हैं कि उनमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है। और हो सकता है शब्दों का मोहजाल उन्होंने अपने पाण्डित्य-प्रदर्शन हेतु रचा हो। फिर भी इन रचनाओं पर इतनी छोटी टिप्पणियाँ लिखना कम-पे-कम जीवट भरा कार्य तो कहा ही जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह कि लघुकथा-समीक्षा-क्षेत्र में इसका स्वागत किया जाना चाहिए ।
इस संकलन की सबसे बड़ी कमजोरी है, इस लघुकथा स्वरूप की कहानी के रुझान की ओर होने का। प्रायः हर रचनाकार की वही रचनाएँ संकलित की गई हैं, जिनमें प्रकृति के अन्य उपादान मुख्य पात्रों के रूप में नहीं आते हैं। साहित्य लेखकों ने लघुकथात्मक रचनाओं में प्रकृतिगत पात्रों पर अपनी कलम बखूबी चलाई है और उनकी ऐसी रचनाएँ आज भी अच्छी लघुकथा के रूप में याद की जाती हैं। सोल्झेनित्सिन की ‘छोटी मछली-बड़ी मछली’, तमिल लेखक अखिलन की मछलियाँ, खलील जिब्रान की ‘साम्राज्यवादी’ कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की भोजन या शत्रु, स्व० कैलाश जयसवाल की ‘पुल बोलते हैं’ उपेन्द्रनाथ अश्क की ‘गिलट’ सतीशराज पुष्करणा की ‘पूर्वजों की सीख’ आदि रचनाएँ जिनमें मछली, कुत्ता, बिल्ली, बन्दर, पक्षी व पुल आदि पात्रों ने मानवीय पात्रों जैसी भूमिका निभाकर अपने कथ्य एवं अभिप्सित को प्रकट किया है। यद्यपि कहानियों में भी प्रकृतिगत पात्रों के कथानक देखने को मिलते हैं; परन्तु आज फेंटेसी को छोड़ कहानी प्रायः मानवीय पात्रों या उनकी मनःस्थिति के कथानकों पर लिखी जाती है, जबकि पौराणिक काल से आज तक लघुकथा ने अपने स्वरूप को बड़ी जिन्दादिली से बरकरार रखा है। लघुकथा शुभचिंतकों को इस तथ्य को बिल्कुल नजर-अंदाज नहीं करना चाहिए। इस संकलन में पशु-पक्षी एवं प्रकृति के अन्य उपादान वाली रचनाओं को लिया जाता, तो इस संकलन की प्रस्तुति बेमिसाल होती; बेमिसाल हो सकती थी ।
फिर भी ‘साम्राज्यवाद’ (नवीन) ‘कालपात्र’ विक्रम सोनी में कुत्ते और भ्रष्टाचार में लघुकथा की स्थिति को स्पर्श करने का प्रयत्न है। कहने का तात्पर्य यह है कि लघुकथा का केनवस इतना छोटा नहीं है कि लेखक मात्र मानवीय पात्रों को ही उसमें चित्रित कर सकता है। बस सवाल इस बात का है कि ऐसे पात्रों को वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, अन्तर्राष्ट्रीय, पारिवारिक व मनोवैज्ञानिक कथ्यों को किस प्रकार जुझारू व सामयिक भूमिका में फिट किया जा सकता है। प्रायः आज नए लेखक इस स्थिति को पौराणिक व पंचतत्रीय बताकर यह दावा पेश करते हैं कि आज की लघुकथा बहुत विकसित हो गई है और प्रकृतिगत पात्रों का निषेध करना लघुकथा की प्रगतिशीलता बखानते हैं। ऐसे लोग तब क्या कहेंगे जब उन पर यह आरोप लगता है कि वे मात्र पुलिस, बलात्कार और, कथनी-करनी और भ्रष्टाचार, बैंक कार्यालय, कर्फ़्यू, मरीज डॉक्टर या डाकू पुलिस की अमानवीयता पर बार-बार कथानक उठाते हैं, जिनसे पाठक ऊब चुका है। मैं उन लेखकों की लेखनी की कद्र करता हूँ जो मानवीय पात्रों के कथानक में अछूते प्रसंग उठाते हैं। प्रस्तुत संकलन में सतीशराज पुष्करणा की ‘सीढ़ी’, ‘अन्तर’ ‘तानाशाह’, ‘इबादत’, और सुकेश साहनी की ‘इमीटेशन’, ‘यम के वंशज’ आदि से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह सही है कि लेखक अपने की चारों ओर के वातावरण से अधिक प्रभावित होता है और ऐसे कथानक लघुकथा में पिरोने की कोशिश करता है परन्तु जब उस पर भावुकता अधिक सवार हो जाती है, तो वह यह नहीं जान पाता कि इसी कथानक पर वह पहले भी एक रचना तैयार कर चुका है या दूसरी रचना का कथानक कहानी या नाटक के लिए उपयुक्त था; लघुकया के लिए नहीं। ऐसा उन स्थितियों में होता है, जब लेखक कहानी, नाटक, उपन्यास एवं साहित्य के अन्य उन रूपों को भी पहचानने में जल्दबाजी दिखाते हैं, जो लघुकथा जैसे लगते हैं।
सवाल इस बात का नहीं है कि कौन-सी रचना संवाद-शैली में लिखी गई है, पत्र या डायरी शैली में। आपत्ति इस बात में है कि शैली बदलकर भी घिसे-पिटे कथानक को दोहराकर लेखक पाठक को धोखा देना चाहता है। यही बात भाषा प्रयोग को लेकर भी है। मात्र आंचलिक बोलियों के शब्दों को कथोपकथन में फिट कर देने से कथानक के दोहराव को छिपाया नहीं जा सकता। मैं यह बात इतनी जोर देकर कह रहा हूँ कि इस तकलीफ को भगीरथ काफी अरसे से महसूस करते आ रहे हैं। इसी बात को चन्द्रभूषण ‘चन्द्र’ ने अपने संकलन में उन रचनाओं का हवाला दिया है, जिनके कथानकों में दोहराव है।
इस संकलन की एक कमजोरी की ओर युवा टिप्पणीकार का ध्यान नहीं गया है। उस बात को मैं ऊपर ही स्पष्ट कर चुका हूँ। यह बिन्दु है- इस संकलन के प्रायः लेखक की दो-तीन रचनाएँ काल तत्त्व दोष से ग्रसित हैं। यही -4 कारण है कि रचनाकारों पर आरोप लग सकता है कि उन्होंने लघुकथा रूप में किसी कहानी के कथानक का उपयोग किया है। ‘प्लीज पे भी’, ‘विडम्बना’ ‘गलतफहमी’, ‘देवली’, ‘तीन चेहरों वाला मै’, ‘दृश्य’ आदि कई ऐसी रचनाएँ हैं जिनके कथानक लघुकथा के लिए आदर्श नहीं हो सकते । ‘तीन चेहरों वाला मैं’ व ‘फोड़ा’ आदि रचनाएँ न जाने किस आधार पर लघुकथा के रूप में छाप दी गई हैं। यह नियति आपत्तिजनक है। आपत्तिजनक इसलिए कि अगर लघुकथा में कोई प्रयोग किया जा रहा है, तो उसमें लघुकथा की सम्पूर्णता/सम्प्रेषणीयता का ध्यान रखा जाना जरूरी है, जिसे लेखक ने समझने का प्रयास ही नहीं किया है ।
इस सारे तामझाम और नियमों को आप एक तरफ उठाकर रख भी दें तो भी कहानी. एकांकी, कविता, संस्मरण के बीच कोई ऐसी छोटी रचना हम पर ऐसा प्रभाव डाल जाती है, जिसमें कहानी, नाटकीयता और कविता की एक मौलिक तथा प्रभावोत्पादक अनुभूति होती है; और एक नई रचना प्रक्रिया को हम अच्छी लघुकथा कहकर अभिहित कर देते हैं और यह रचना 30 सेकेण्ड से डेढ़ मिनिट के अन्दर पढ़ ली जाती है, जो उत्तेजित या स्तब्ध कर देती है। दरअसल ऐसी ही बहुत सारी रचनाएँ हमारे सामने आएँ, तो उसकी एक निश्चित रचना प्रक्रिया, शिल्प-विधान और तकनीकी आधार को सम्पुष्ट करने में सहायता मिल सकती है । ऐसी ही रचनाओं का लघुकथा में स्वागत है। इस दृष्टिकोण से ‘तत्पश्चात्’ बहुत अधिक आशा तो नहीं जगाता; परन्तु उस ओर ले जाने के लिए इसमें बहस की पर्याप्त गुंजाइश है और यही ‘तत्पश्चात्’ की जबरदस्त सार्थकता है, जिसका लघुकथा- जगत् में जमकर स्वागत होगा ही ।