आज फिर वह आया और बिस्तर पर गिर गया धड़ाम से।
किसी कटे पेड़ की तरह। तकिया आज फिर कसमसाया, पर पूछ न पाया, ‘‘आखिर यह आदमी कितना लड़ता है दिन–भर कि यूं पस्त हो जाता है?’’ उसने अपने आप से पूछा, ‘‘आखिर, ये दिन जीने के लिए होता है य: तिल–तिल मरने के लिए?’’ सोचते–सोचते तकिए को नींद आ गई और वह जागता रहा….
एक दिन फिर ऐसा हुआ कि वह आया और लगा फूट–फूटकर रोने तकिए को सीने में भींचकर। खूब रोया। रोता गया और तकिए को आपनी अबाहों में बाँधे रहा, सीने से चिपकाता रहा। अपना मुँह तकिए में ढाँपता रहा। तकिया आज फिर आँसुओं से भीग गया। तकिया आज फिर आँसुओं से भीग गया। तकिया एक बार फिर सोचने को मजबूर हुआ, ‘‘आखिर सब लोग तकिए को ही अपना हमराज क्यों बनाते हैं? क्या आदमी पर से आदमी का विश्वास उठ गया?’’
तकिए को इस बार नींद नहीं आई। उसने सोचा,अगर दुनिया के सारे तकिए हड़ताल पर चले जाए तो? तो क्या आदमी आदमी को यूं भींचेगा तकिए की तरह? क्या फिर से लौट आएगा आदमी पर से उठा आदमी का विश्वास??
….तकिए ने सोचा, ‘‘क्या आदमी नहीं बन सकता तकिया आदमी के लिए?’’