नवम्बर 2026

अध्ययन -कक्षडॉ. सतीशराज पुष्करणा की उत्तरकालीन लघुकथाएँ     Posted: November 1, 2026

किसी लेखक की अंतिम दौर की रचनाओं में बीते जीवन की परछाइयाँ, वर्तमान की बेचैनियाँ और कुछ पुराने विश्वास साथ चलते हैं। डॉ. सतीशराज पुष्करणा की अंतिम अट्ठाईस लघुकथाएँ इसी कारण विशेष लगती हैं। जीवन की साँझ में वे संबंधों, स्मृतियों, सामाजिक बदलावों और मनुष्य के भीतर बची भलमनसाहत को एक बार फिर परखते हैं। अस्वस्थता, विस्थापन और कोरोना काल की घुटन के बीच भी उनका लेखन नहीं रुका। उलटे, वह पहले से अधिक निजी और आत्मपरीक्षक हुआ। शिल्प की नई राहों को आज़माने की उत्सुकता भी दिखाई दी। प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य डॉ. सतीशराज पुष्करणा की उन अट्ठाईस लघुकथाओं में से कुछेक पर चर्चा करना है, जो उनके जीवनकाल में पाठकों तक नहीं पहुँच सकीं और उनके विदा हो जाने के बाद प्रकाश में आईं। इन रचनाओं में उनके सृजन का वह उत्तरपर्व खुलता है, जिसमें जीवन की साँझ के अनुभव, स्मृतियाँ और सरोकार सुरक्षित हैं। इन्हें पढ़ना उस रचनाकार के अंतिम स्वर को सुनना है, जो स्वयं मौन हो जाने के बाद भी अपने शब्दों में हमारे बीच बोलता रहा।

इन उत्तरकालीन लघुकथाओं के पीछे एक मार्मिक प्रसंग जुड़ा है। अस्वस्थता के कारण डॉ. पुष्करणा कोरोना काल शुरू होने से पहले ही पटना छोड़कर दिल्ली में अपनी पुत्री के पास आ गए थे। बीच-बीच में वे बागपत में रहने वाली दूसरी पुत्री के पास भी जाते रहे। ये रचनाएँ इसी दिल्ली-बागपत प्रवास में लिखी गईं। अधिकतर रचनाओं पर दर्ज स्थान और तारीख़ उनके जीवन के उस कठिन, फिर भी सृजनशील समय की मौन गवाही देते हैं। उपलब्ध तिथियाँ मुख्यतः मई 2020 से जनवरी 2021 के बीच की हैं, इसलिए इनका कालक्रम भी काफ़ी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वे रचना हाथ से लिखते और उन पन्नों की तस्वीरें कल्पना भट्ट को भेज देते थे और वे उन्हें कंप्यूटर पर टंकित करती थीं। मुझे इस प्रक्रिया की जानकारी उसी समय से थी। उनके अवसान के बाद कल्पना भट्ट ने ये सभी लघुकथाएँ मुझे भेजीं। उनकी इच्छा थी कि इन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाए। दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों मेरे परिवार के कई सदस्यों का अचानक निधन हुआ और मैं गहरे अवसाद से गुज़र रहा था। उस हालत में यह काम स्वयं आगे बढ़ा पाना संभव नहीं था। आख़िर मैंने सभी रचनाएँ डॉ. पुष्करणा की एक शुभचिंतक विभा रानी श्रीवास्तव को सौंप दीं। उन्होंने अपने संपादन में वर्ष 2023 में प्रकाशित संकलन ‘गोधूलि’ में इन्हें स्थान दिया। इस तरह उनके रचनात्मक जीवन के अंतिम चरण की ये लघुकथाएँ सुरक्षित भी रहीं और पाठकों तक भी पहुँचीं। महामारी के बीच बचा हुआ मनुष्य इन रचनाओं का बड़ा हिस्सा कोरोना काल की मानवीय और मानसिक उथल-पुथल से निकला है। ‘क़दमों की बढ़ती गति’ में घर लौटते प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा सड़क की मानवीकृत आवाज़ से सुनाई देती है। सड़क थके पाँवों की साक्षी है और किसी बुज़ुर्ग की तरह उन्हें सलाह भी देती है। कथा मज़दूरों को बेबस भीड़ की तरह नहीं देखती। वे सोचने और अपना निर्णय लेने वाले मनुष्य हैं। संवाद कुछ जगह विचार-वक्तव्य की ओर बढ़ते हैं, फिर भी महामारी के शुरुआती दिनों की अफ़रा-तफ़री और लंबी पैदल यात्राओं की पीड़ा रचना में दर्ज हो गई है। ‘जब जागो…’ बीमारी, उम्र और निष्क्रियता के बीच रचना-कर्म का अर्थ खोजती है। एक अस्वस्थ साहित्यकार अपने स्वस्थ, मगर सुस्त मित्र के लिए प्रेरणा बन जाता है। मृणाल का लगातार पढ़ना-लिखना अभिलाष को भीतर तक झकझोर देता है। प्रसंग में लेखक की अपनी अस्वस्थता और उसके बावजूद चलती रही सृजन-यात्रा की छाया महसूस होती है, हालाँकि इसे सीधे आत्मकथात्मक कहना ठीक नहीं होगा। रचना का मूल स्वर इतना है कि वृद्धावस्था निष्क्रिय बैठने का नाम नहीं, उपलब्ध समय को सार्थक करने का अवसर भी हो सकती है। ‘रामायण के भाई’ लॉकडाउन से पैदा हुई आर्थिक विषमता को परिवार के भीतर रखकर देखती है। एक भाई को पेंशन मिल रही है, दूसरे की रोज़ी बंद है। धार्मिक धारावाहिक में दिखता भ्रातृप्रेम पति को अपने घर की दीवार याद दिलाता है। वह मन की दूरी मिटाने के साथ ईंट की दीवार भी तुड़वाना चाहता है। प्रतीक साफ़ है। पत्नी की तुरंत सहमति और संबंधों का इतनी जल्दी सुधर जाना कुछ आदर्शवादी ज़रूर लगता है, मगर कथा के भीतर कठिन समय में परिवार की ओर लौटने की सच्ची इच्छा है। संकट रिश्तों की परीक्षा लेता है, कभी उन्हें फिर जोड़ने का मौक़ा भी देता है। ‘कोरोना डर से दूर’ बाहरी बंदी से अधिक मन में जम गई जड़ता की कथा है। भय ने पात्र की काम करने की इच्छा दबा दी है। अपनी निष्क्रियता पहचानते ही वह अधूरे लेखन की ओर लौटता है। यह बदलाव कुछ तेज़ी से आता है और एवरेस्ट का बिंब उत्साह को ज़रूरत से ऊँचे स्वर में कहता है। इसके बावजूद रचना उस हालत को ठीक पकड़ती है जिसमें आदमी आपदा से कम, अपनी असमर्थता से अधिक डरने लगता है। इन लघुकथाओं में महामारी केवल पृष्ठभूमि नहीं। वह रोज़ी, स्वास्थ्य, संबंध और सृजनशीलता को नए सिरे से देखने का दबाव बनती है। स्मृति, परिवार और संबंधों की मरम्मत डॉ. पुष्करणा की उत्तरकालीन संवेदना बार-बार परिवार की ओर लौटती है। यह वापसी केवल भावुक स्मरण नहीं है। उसमें पछतावा, शिकायत, अपराधबोध और टूटे संबंध को फिर जोड़ लेने की इच्छा साथ चलती है। ‘काश!! माँ लौट आती’ में अधिकारी की डाँट एक कर्मचारी को अपनी माँ तक ले जाती है। वह कभी माँ पर हाथ उठा चुका था और अब क्षमा माँगने के लिए माँ जीवित नहीं। वर्तमान की फटकार अतीत का बंद दरवाज़ा खोल देती है। पात्र का उसी क्षण सुधर जाने का संकल्प कथा को बहुत भावुक मोड़ देता है, फिर भी असली चोट उस अवसर की है जो हमेशा के लिए हाथ से निकल चुका है। ‘बचपन’ इस उदासी के बीच हल्की, स्नेह से भरी रचना है। तीन वर्ष के नोनू को सँभालते हुए नाना ख़ुद बच्चा बन जाते हैं। उम्र का फ़ासला खेल में मिट जाता है। बालक को चुप कराने की एक छोटी युक्ति वृद्ध को अपने बीते दिनों तक पहुँचा देती है। यह मामूली घरेलू घटना फिर याद दिलाती है कि वे बड़े कथ्य के लिए हमेशा बड़ी घटना नहीं खोजते। ‘नदी के दो पाट’ स्मृति को एक पुरानी निजी शिकायत की जड़ तक ले जाती है। भाई की मृत्यु का समाचार सुनते ही मंगला विभाजन के दिनों में लौट जाती है। तब उसके रोते शिशु को बोझ समझकर फेंक देने तक की बात कही गई थी। बरसों बीत गए, मगर वह एक वाक्य उसके भीतर से नहीं गया। रक्त-संबंध और निभाए हुए संबंध का फ़र्क़ इसी स्मृति से खुलता है। विभाजन यहाँ इतिहास की दुर्घटना भर नहीं रहता, वह बहन और भाई को मानसिक रूप से दो पाटों में बाँट देता है। समय का फैलाव बड़ा है, मगर वर्तमान से अतीत और फिर वर्तमान तक की आवाजाही कथा को बिखरने नहीं देती। पति-पत्नी के छोटे-से मान और मनुहार पर केंद्रित ‘झूठा अहं’ में घरेलू जीवन की जानी-पहचानी गरमाहट है। दोनों बात करना चाहते हैं, पहल कोई नहीं करना चाहता। भूख, रसोई की खटपट और परोसा हुआ भोजन उस चुप्पी को तोड़ देते हैं जिसे तर्क नहीं तोड़ पाया। कथा कुछ फैलती है। स्त्री को मूलतः मातृरूप में देखने वाली टिप्पणी लेखक की परिचित मूल्य-दृष्टि भी सामने लाती है। फिर भी दांपत्य की रोज़मर्रा वाली रूठन को सहज हास्य के साथ पकड़ा गया है। पीढ़ियों के साथ बदलते व्यवहार को ‘बदलती भूमिका’ बड़ी सहजता से खोलती है। जो पिता कभी बेटे के लिए कठोर था, दादा बनते ही पोते के लिए नरम हो जाता है। यह एक ही मनुष्य के भीतर दो स्वभावों की बात नहीं, दो भूमिकाओं का फ़र्क़ है। स्मृति में आया छोटा संवाद परिवर्तन को बिना उपदेश के कह देता है। ‘दीप जल उठे’ परिवार में लंबे समय से दबे वियोग को सामने लाती है। नाना के पास छोड़ा गया बेटा सुविधाओं के बावजूद माता-पिता से दूर रहने की क़ीमत चुका चुका है। उसका यह कहना कि वह बचपन से सीधे बुढ़ापे में पहुँच गया, कथा की सबसे पीड़ादायक पंक्ति बनती है। पिता का प्रवेश पुनर्मिलन की संभावना खोलता है। उसकी शिकायत संबंध तोड़ने के लिए नहीं, खोया हुआ घर वापस पाने के लिए है। इसके उलट ‘रहिमन राखा…’ में दादा और पोते के बीच पड़ी दरार के भरने की उम्मीद बहुत कम बची है। फाड़े गए काग़ज़ को टेप से जोड़ने का दृश्य प्रेम के टूटे धागे को मूर्त कर देता है। मोबाइल खेलों में डूबे पोते की उपेक्षा से आहत दादा स्थानांतरण का निर्णय लेता है। फ़ैसला कठोर है, मगर उसके पीछे एक दिन की नाराज़गी नहीं, लंबे समय की चोट है। इन पारिवारिक रचनाओं में संबंध जन्म से मिली व्यवस्था भर नहीं, हर दिन निभाया जाने वाला दायित्व हैं।

साधारण जीवन की नैतिकता इन लघुकथाओं में नैतिकता पैसे, भोजन, पढ़ाई और मिलने-जुलने जैसी मामूली स्थितियों में अपना अर्थ पाती है। ‘औपचारिकता’ का पात्र रिश्तेदारों के घर न जाने का कारण साफ़ शब्दों में बता देता है। लेन-देन और बच्चों को पैसे देने का ख़र्च उसके वेतन पर भारी पड़ता है। उसकी साफ़गोई से सबको राहत मिलती है, क्योंकि परेशानी अकेले उसकी नहीं थी। संबंध बचाने का रास्ता दिखावा घटाने से निकलता है। हास्य उस बोझ को हल्का कर देता है जिसे सब ढो रहे थे, पर कोई मान नहीं रहा था। ‘उपहार’ में शिक्षक ग़रीब छात्रा से मिली पूरी ट्यूशन फ़ीस सँभालकर रखता है और परीक्षा में सफल होने पर लौटा देता है। मदद को दान बनाकर लड़की के आत्मसम्मान पर चोट नहीं की जाती। शिक्षक ख़ुद को पेशे से पहले एक मनुष्य और परिवार वाला आदमी मानता है। करुणा यहाँ भावुक उद्गार नहीं, आगे की पढ़ाई के लिए ठोस आर्थिक सहारा बनती है। यही मानवीय ज़मीन ‘भूख’ में आगे बढ़ती है। पिता दरवाज़े से भगाए गए भिखारी को वापस बुलाकर भोजन कराते हैं। फिर बेटे को उस विवशता के बारे में बताते हैं जो उन्होंने रुकी हुई ट्रेन में भूखे रहते हुए झेली थी। दूसरे की पीड़ा समझने में अपनी स्मृति उनके काम आती है। पिता उपदेश भर नहीं देता, उस क्षण में लौटता है जब किसी का भोजन के लिए पूछ लेना भी भूखे मनुष्य को भीतर तक रुला सकता है। शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध का दूसरा उजला रूप ‘आस्था’ में है। अस्पताल में रक्त देने पहुँचे छात्र-छात्राओं का समूह बताता है कि अध्यापक की असली कमाई शिष्यों का स्नेह है। ‘बाबा’ शब्द को लेकर उठी जिज्ञासा ऐसे शिक्षक की पहचान खोलती है जिसने विद्यार्थियों को संतान की तरह अपनाया। रक्तदान की ठोस क्रिया कथा की भावुकता को ज़मीन देती है। घर के भीतर की नैतिक चिंता का दूसरा सिरा ‘बिगड़ता भविष्य’ में मिलता है। पिता की जेब से निकले दो हज़ार रुपये का भेद दुकानदार की सूचना से खुलता है। माता-पिता को चोरी से अधिक इस बात का भय है कि संदेह निर्दोष मेहमानों पर जा सकता था। अंत का अँधेरा बेटे की आदत के साथ घर में टूटते भरोसे का संकेत बनता है। एक नोट, एक भूखा आदमी, लौटाई हुई फ़ीस या रक्त देने वालों की क़तार, पुष्करणा के यहाँ ऐसी छोटी चीज़ें ही मनुष्य की परीक्षा लेती हैं।

स्त्री, आधुनिक संबंध और वर्ग नए स्त्री-पुरुष संबंधों को लेखक अपनी संस्कारगत दृष्टि से देखते हैं, फिर भी उनकी कई स्त्रियाँ फ़ैसला करती हैं और ज़रूरत पड़ने पर प्रतिकार भी। ‘धरती-आकाश’ में युवक बचपन की मित्र के साथ विवाह का भविष्य अपने मन से तय कर लेता है, जबकि लड़की ने कोई संकेत नहीं दिया। दिल्ली पहुँचने पर उसे पता चलता है कि लड़की अपना जीवन चुन चुकी है और उसे गाँव के भाई के रूप में देखती है। मित्र का आकाश की ओर देखना युवक की आत्ममुग्धता पर हल्का-सा व्यंग्य है। बचपन की निकटता किसी पुरुष को स्त्री के भविष्य पर अधिकार नहीं दे देती। ‘रॉन्ग नंबर’ में विवाहित स्त्री मित्रता की सीमा लाँघने वाले पुरुष को तुरंत रोकती है। थप्पड़ और तीखे संवाद उसके आत्मसम्मान को सामने लाते हैं। पति के अधिकार वाली भाषा आज के पाठक को परंपरागत लग सकती है, मगर स्त्री की सहमति की अनदेखी करने वाले पुरुष के लिए कथा में कोई नरमी नहीं। शीर्षक प्रेम के भ्रम को ग़लत मिले नंबर में बदलकर एकतरफ़ा इच्छा की असलियत खोल देता है। सामाजिक विषमता को ‘वर्ग-भेद’ विषमबाहु त्रिभुज की तीन भुजाओं से कहती है। बड़ी भुजा सत्ता और संसाधन के बल पर छोटी का इस्तेमाल करती है, जबकि बीच वाली भुजा शिक्षा और स्वाभिमान के सहारे स्वतंत्र हो जाती है। गणित की आकृति सामाजिक संबंधों का नक्शा बन जाती है। रूपक पूरी तरह खुला हुआ है, फिर भी बहुत कम पात्र-सामग्री में वर्गों की निर्भरता, उपयोग और अलगाव सामने आ जाते हैं। ‘उधेड़बुन’ स्त्री की करुणा और सामाजिक भय के बीच चलती बहस है। बरसात में काँपते अधेड़ को वह कपड़े और चाय देना चाहती है, मगर घर में अकेली होने का बोध उसे रोकता है। मदद कर देने के बाद भी आशंका उसका पीछा नहीं छोड़ती। मनुष्यता ज़रूरी है, पर स्त्री की असुरक्षा भी कोई कल्पना नहीं। ठंडी पड़ी चाय उसके भीतर बचे तनाव को चुपचाप कह देती है। इस असुरक्षा का प्रतिरोधी रूप ‘विवशता के बावजूद’ में मिलता है। रेल में छेड़छाड़ झेल रही युवती आसपास बैठे लोगों की निष्क्रियता से और अकेली पड़ जाती है। बाहर हमलावरों से भिड़ते कुत्ते को देखकर उसके भीतर साहस जागता है। दृश्य बहुत तेज़ी से नाटकीय होता है, मगर उसका धक्का पूरे डिब्बे की जड़ता तोड़ देता है। सहायता बाद में मिलती है, पहला क़दम युवती ख़ुद उठाती है। लेखक की स्त्री-दृष्टि में परंपरागत संस्कार ज़रूर हैं, स्त्री को पूरी तरह असहाय मान लेने की स्वीकृति नहीं।

शिक्षा, साहित्य और बदलता सामाजिक विवेक साहित्य और शिक्षा की दुनिया से डॉ. पुष्करणा का रिश्ता बहुत पुराना था। इसलिए वहाँ की छोटी प्रवृत्तियाँ भी उनकी नज़र से बचती नहीं। ‘जिसकी जैसी दृष्टि’ में ख़ाली पीरियड में हुई लघुकथा-गोष्ठी एक शिक्षक को राजनीतिक बैठक दिखाई देती है। प्राचार्य की छोटी-सी टिप्पणी उस मानसिकता को खोल देती है जिसमें आदमी हर जगह वही देखता है जो उसके भीतर भरा है। प्रसंग हल्का है, मगर दृष्टि और पूर्वग्रह का संबंध साफ़ कर जाता है। ‘बदलते समय का यथार्थ’ मित्र के हाथों मित्र की हत्या की ख़बर से पुराने जमाने की मित्रता तक लौटती है। वृद्ध पात्र ने कभी डूबते मित्र को बचाने के लिए नदी में छलाँग लगा दी थी। इसी कारण नई घटना उसे पूरी पीढ़ी के पतन का प्रमाण लगती है। स्मृति का ताप असरदार है, मगर एक समाचार के आधार पर नई पीढ़ी को स्वार्थी मान लेना चिंता को बहुत जल्दी निष्कर्ष तक पहुँचा देता है। इसे उस वृद्ध मन की जल्दबाज़ी भी कहा जा सकता है जो अपनी आँखों के सामने पुराने मूल्य टूटते देख रहा है। ‘सुंदर ढंग’ धूम्रपान करने वाले किशोर को दंड के बजाय व्यंग्य से समझाने की कोशिश करती है। पिता खुलेआम सिगरेट पीने की छूट देने जैसा व्यवहार करते हैं तो लड़का रोते हुए उनके पैर पकड़ लेता है और उसी समय सिगरेट छोड़ने की प्रतिज्ञा कर देता है। समझाने की युक्ति दिलचस्प है, हालाँकि हृदय-परिवर्तन इतनी तेज़ी से आता है कि उसके भीतर की तैयारी नहीं दिखती। फिर भी लेखक का भरोसा दबाव डालने में नहीं, आत्मबोध जगाने में है। साहित्यिक संस्था के भीतर का भ्रष्टाचार ‘पोल खुल गई’ में सीधे प्रसंग से पकड़ा गया है। निरीक्षण, पुरानी मुद्रण-दरें और निदेशक तथा लेखापाल का कमीशन, ये सब प्रशासनिक भाषा में छिपे शोषण को खोलते हैं। आवेदन पढ़ते ही निदेशक का टॉयलेट की ओर जाना व्यंग्यात्मक अंत रचता है। साहित्य की दुनिया भी मानवीय कमज़ोरियों और संस्थागत बेईमानी से मुक्त नहीं। लेखक यहाँ भाषण नहीं देता, लिखित आवेदन को ही प्रमाण बनने देता है।

उत्तरकालीन शिल्प में नया मोड़ अपने लंबे रचनाकाल में डॉ. पुष्करणा ने इससे पहले प्रयोगात्मक शैली में लिखी लघुकथाएँ देखने को नहीं मिलतीं। उनकी पसंद सदैव सीधी कथात्मक और संवादात्मक शैली रही। अंतिम रचनाओं में पहली बार पत्र-शैली, डायरी-शैली और टेलीफोन-शैली सामने आती है। इसे स्थापित अभिव्यक्ति-पद्धति से बाहर निकलने की इच्छा भी कहा जा सकता है और अनुभव-संपन्न रचनाकार की उत्तरकालीन जिज्ञासा भी। पत्रात्मक-शैली की लघुकथा ‘…जो कभी पोस्ट न हुआ’ दिवंगत माँ को लिखे ऐसे पत्र के रूप में सामने आती है जिसे कहीं भेजा नहीं जा सकता। रक्षाबंधन, घर की खीर और माँ की अनुपस्थिति मिलकर रिक्तता का निजी संसार बनाते हैं। यह शैली पात्र को बिना किसी मध्यस्थ के बोलने देती है। लिखना अपने अकेलेपन से बात करने का ज़रिया बन जाता है। आख़िर में खीर में मिला माँ के हाथ का स्वाद स्मृति के सहारे अनुपस्थिति को थोड़ी देर के लिए उपस्थिति में बदल देता है। डायरी-शैली की ‘कुछ अविस्मरणीय पृष्ठ’ में तीन अलग वर्षों की डायरी-प्रविष्टियाँ पिता की अनुपस्थिति का रहस्य धीरे-धीरे खोलती हैं। बालक पहले सवाल करता है, किशोरावस्था में बेचैन होता है और युवा होकर लौटे पिता के सामने खड़ा हो जाता है। डायरी-शैली लंबे समय को चुनी हुई तिथियों में समेट लेती है। आख़िरी प्रविष्टि में माँ का एक वाक्य पिता का नैतिक क़द बहुत छोटा कर देता है। कई वर्षों का फैलाव लघुकथा की सीमित कालावधि को छूता ज़रूर है, मगर क्रम से खुलता रहस्य पाठक की जिज्ञासा थामे रखता है। ‘प्रेरणा की प्रेरणा’ शीर्षक से लघुकथा टेलीफोन-शैली में लिखी गई है। पाठक केवल पुरुष की आवाज़ सुनता है। दूसरी ओर कही जा रही बातों की जगह बिंदु हैं। इन्हीं संकेतों से संवाद पूरा होता है और अनसुनी आवाज़ का अनुमान पाठक लगाता है। सहजीवन, विवाह, आर्थिक स्वतंत्रता और स्त्री की पसंद जैसे सवाल बातचीत में आते हैं। रिक्त स्थानों से अनुपस्थित संवाद को सुनाने का यह प्रयास उनके शिल्प में नया है।

इन तीन रूपों के अलावा आत्मालाप, स्मृति, मानवीकरण, रूपक और पूर्वदीप्ति भी मिलते हैं। डॉ. पुष्करणा की भाषा मूलतः पहुँचने और बात कहने की भाषा है। शब्दों की चमक से अधिक उन्हें अर्थ की स्पष्टता पर भरोसा है। पात्र मध्यवर्गीय घरों, विद्यालयों, दफ्तरों और रेल यात्राओं से आते हैं। संवाद कथा को आगे बढ़ाते हुए मानसिकता भी खोलते हैं। कभी-कभी वे पात्र की सहज बोली पीछे छोड़कर लेखक के विचार का भार उठाने लगते हैं और आशय समय से पहले खुल जाता है। इसके बाद भी शिल्प बदलने की यह कोशिश उनके रचनात्मक जीवट का पता देती है।

रचनात्मक उपलब्धियाँ और कुछ विधागत सीमारेखाएँ इन अट्ठाईस लघुकथाओं की पहली उपलब्धि साधारण मनुष्य पर लेखक का अटूट भरोसा है। मज़दूर, शिक्षक, विद्यार्थी, वृद्ध, स्त्री, भूखा भिखारी, बेरोज़गार भाई और उपेक्षित बच्चा किसी सिद्धांत का उदाहरण बनने नहीं आते। लेखक उन्हें अपनापे से देखता है और टूटने के बाद भी सँभलने का अवसर देता है। अभाव को वह अपमान में नहीं बदलता। फ़ीस लौटाने वाला शिक्षक हो या भूखे को घर बुलाने वाला पिता, मदद का अर्थ तभी है जब सामने वाले की गरिमा बची रहे। दूसरी उपलब्धि संबंधों की मरम्मत में उनका विश्वास है। उनके यहाँ परिवार किसी आदर्श तस्वीर की तरह नहीं मिलता। वहाँ दीवारें हैं, अहं है, उपेक्षा, पीढ़ियों की दूरी और बरसों पुरानी चोटें भी। फिर भी संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता। यही नैतिक आशावाद उत्तरकालीन लेखन की पहचान है। अँधेरा उन्हें दिखाई देता है, मगर वे छोटे-से दीप, लौटती बातचीत या मनुष्य की करुणा के लिए थोड़ी जगह बचाकर रखते हैं। कुछ विधागत सीमाएँ भी इसी मूल्य-दृष्टि से निकलती हैं। मनुष्य के सुधरने पर लेखक का भरोसा इतना गहरा है कि कहीं-कहीं बदलाव बहुत जल्दी हो जाता है। एक वाक्य, दृश्य या स्मृति पात्र को तुरंत नए फ़ैसले तक पहुँचा देती है। कई अंत भाव को खुला छोड़ने के बजाय उसका आशय ख़ुद बता देते हैं। संवाद भी कभी पात्र की बोली से हटकर सधे हुए वक्तव्य बनने लगते हैं। इससे रचनाओं की मानवीय चिंता कम नहीं होती। इतना ज़रूर दिखता है कि कुछ जगह लेखक का नैतिक आग्रह शिल्प से आगे निकल आया है। लंबे रचनाकाल के अंतिम पड़ाव में यह ऊँच-नीच अस्वाभाविक नहीं। बड़ी बात यह है कि अस्वस्थता और महामारी के बीच भी उनका लेखक जीवन से मुँह मोड़कर नहीं बैठा।

इन अंतिम लघुकथाओं में डॉ. सतीशराज पुष्करणा की परिचित मनुष्य-केंद्रित दृष्टि, सामाजिक सजगता और नैतिक विश्वास मौजूद हैं। फ़र्क़ यह है कि बाहरी व्यवस्था के साथ अब उनका ध्यान घर, स्मृति, उम्र, बीमारी और छूटते संबंधों पर अधिक टिकता है। स्वर में थकान है, पछतावा है और पुरानी दुनिया के लिए मोह भी। इन सबके पीछे जीने और जोड़ने की इच्छा बनी रहती है। नए शैलीगत प्रयोग बताते हैं कि अंतिम समय तक वे अभिव्यक्ति की दूसरी राहें टटोलते रहे। इन रचनाओं का महत्त्व केवल इतना नहीं कि ये उनकी अंतिम लघुकथाएँ हैं। इनका महत्त्व उस मानवीय दस्तावेज़ में है जो बीमारी, महामारी, विस्थापन और निजी एकांत के बीच तैयार हुआ। जीवन की साँझ में भी लेखक ने छोटे प्रसंगों में कथा खोजी, मनुष्य की कमजोरियाँ देखीं और उसके भीतर बची करुणा पर भरोसा रखा। इसलिए यह संकलन केवल विदाई नहीं, रचनात्मक जिजीविषा का प्रमाण बनता है।

संदर्भ ग्रंथ:

‘गोधूलि’ (2023), सं: विभा रानी श्रीवास्तव, श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा

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