जून 2026

दस्तावेज़डरे हुए लोग     Posted: February 1, 2026

डरे हुए लोग लघुकथा–संग्रह समकालीन हिन्दी चेतना में केवल एक सृजनात्मक उपलब्धि भर नहीं है, बल्कि हमारे समय की सामाजिक, नैतिक, मानसिक और संवेदनात्मक विडंबनाओं का एक गहन, जटिल और बहुस्तरीय दस्तावेज़ है। यह संग्रह उस सच्चाई को शब्द देता है, जो प्राय उपस्थित रहते हुए भी अनदेखी रह जाती है या जिसकी सच्चाई हम अपनी सुविधाजनक चुप्पी की आड़ में ढक लेते हैं। बाहरी रूप से यह लघुकथाएँ साधारण घटना भर लग सकती हैं; किंतु उनके अंतर में सघन अनुभव नैतिक दबाव और मानवीय अंत की पीड़ा छुपी है; जो इन्हें इनके कलेवर में असाधारण बना देती है।

इस संग्रह का सबसे बड़ा आकर्षण इसके यथार्थ में है, उस स्वाभाविकता में है, जो बिना किसी अलंकरण बिना किसी नाटकीयता और भावोच्छ्वास के ही प्रस्तुत किया गया है। लेखक की क़लम ज़िन्दगी के उन सीधे अनुभवों में छपी असाधारण त्रासदी से परिचित है और लेखक अपने कौशल से अत्यंत संयमित भाषा में पाठक को उसका सहयात्री बना देता है। परिणामस्वरूप ये लघुकथाएँ पाठक को तुरंत सम्मोहित नहीं करती; बल्कि इस यात्रा में पाठक धीरे-धीरे इन कथाओं में उतरता जाता है और इनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है। यह साहित्य पढ़े जाने से अधिक झेले जाने का अनुभव कराता है।

यह लघुकथा-संग्रह किसी एक मत, प्रसंग या किसी एक चरित्र की कथा नहीं है; बल्कि यह उन अनगनित पलों का संग्रह है, जो हमारे जीवन में अक्सर अनदेखे और अनकहे रह जाते हैं। ये कथाएँ शोर नहीं करती न ही पाठक को भ्रमित करती है, न घोषणा करती हैं, न पाठक पर कोई निष्कर्ष थोपती हैं; ये बस, एक छोटी-सी घटना समाहित करती हैं और फिर पाठक को उसके अपने अनुभवों के सहारे छोड़ देती हैं। यही इस संग्रह की शक्ति है। यहाँ लेखक जीवन को ‘लघुकथा’ बनाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि जीवन के भीतर पहले से मौजूद कथा को पहचानकर उसे बहुत कम शब्दों में दर्ज कर देता है। यह संश्लिष्टता केवल शिल्पगत नहीं है; बल्कि यह एक नैतिक और दार्शनिक चुनाव भी है—कि अधिक कहना अधिक सुनाना अक्सर सत्य को प्रच्छन्न कर देता है, मौन ही उसे मुखर बनाता है।

ध्यान देने पर यह ज्ञात होता है कि यह भावुकता और मार्मिकता इन कथाओं में सहसा नहीं प्रकट होती, वह धीरे-धीरे बनती है। अक्सर कथा का अंत किसी चौंकाने वाले मोड़ पर नहीं; बल्कि एक साधारण-से वाक्य या दृश्य पर होता है, जो पढ़ लेने के बाद देर तक मस्तिष्क में घूमता रहता है। यह गूँज ही असल मार्मिकता है। लेखक पाठक को भावुकता से भरने की अपेक्षा मनन की स्थिति में डालना पसंद करता है और यह सोच कहीं अधिक गहरी चोट करती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि कथा समाप्त नहीं हुई है, बल्कि पाठक के भीतर जाकर आगे बढ़ रही है। यही लघुकथा की वास्तविक सफलता है—जब वह काग़ज़ से निकलकर पाठक के मन का हिस्सा बन जाए।

हालाँकि तार्किक स्तर पर कहीं-कहीं यह भी महसूस होता है कि संकेतात्मकता इतनी अधिक है कि कारण और परिणाम के बीच का सम्बंध बहुत महीन हो जाता है। कुछ कथाओं में पाठक को यह अनुमान लगाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है कि पात्र ने कोई विशेष निर्णय क्यों लिया या किसी घटना का प्रभाव इतना गहरा क्यों पड़ा। यह कमी नहीं; बल्कि एक जोखिम है, जो लेखक ने जानबूझकर लिया है। यह जोखिम उन पाठकों के लिए चुनौती बन सकता है, जो स्पष्ट कथानक और ठोस निष्कर्ष के आदी हैं; लेकिन वही पाठक, जो साहित्य को एक सक्रिय संवाद मानते हैं, उनके लिए यह शैली अत्यंत समृद्ध अनुभव बन जाती है।

इस संग्रह की लघुकथाओं को संवेदना की दृष्टि से पढ़ते हुए सबसे पहले यह अनुभूति होती है कि लेखक का सरोकार किसी वैचारिक प्रदर्शन से अधिक मनुष्य के भीतर दबे हुए डर, पीड़ा, विवशता और मौन से है। ये लघुकथाएँ पढ़ते समय पाठक किसी कथा–घटना से नहीं, बल्कि एक मनःस्थिति से टकराता है। यहाँ संवेदना करुणा के शोरगुल में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के साधारण दृश्यों में छिपी हुई है।

इन लघुकथाओं की संवेदना किसी एक वर्ग या चरित्र तक सीमित नहीं रहती। किसान, बच्चा, अधिकारी, माँ, पेट्रोल जैसी निर्जीव वस्तु—सब अपने-अपने ढंग से पीड़ित हैं। यह पीड़ा कभी भूख की है, कभी भय की, कभी नैतिक द्वंद्व की और कभी संवेदनहीनता के बोझ की। लेखक किसी पात्र के आँसू नहीं दिखाता; लेकिन पाठक के भीतर एक चुप-सी कसक छोड़ देता है। यही संवेदनात्मक लेखन की सबसे बड़ी शक्ति है।

पारिवारिक सम्बंधों को लेकर लिखी गई लघुकथाएँ इस संग्रह की संवेदनात्मक रीढ़ निर्मित करती हैं। आधुनिक परिवार यहाँ प्रेम, सुरक्षा और आत्मीयता का आश्वासन नहीं; बल्कि अपेक्षाओं, अधिकार-बोध और असमानताओं का परिसर बनकर सामने आता है। मोहभंग जैसी कथा में छोटे भाई का अपने ही घर में पराया हो जाना, किसी तीव्र संघर्ष का परिणाम नहीं; बल्कि उपेक्षा, तुलना और अहंकार के धीरे-धीरे जमते हुए बोझ का निष्कर्ष है। यह कथा आधुनिक समाज में रिश्तों के उस मौन क्षरण को रेखांकित करती है, जहाँ सम्बंध भावनाओं से नहीं; बल्कि उपलब्धियों और सामाजिक हैसियत से संचालित होने लगे हैं। यहाँ लेखक किसी को दोषी ठहराने की सुविधा नहीं देता; बल्कि पूरे सामाजिक ढाँचे को प्रश्नांकित करता है।

गोश्त की गंध को यदि केवल दहेज या पारिवारिक शोषण की कथा कहा जाए, तो वह इसके प्रतीकात्मक स्तर को खो देगा। यह कथा रिश्तों के भीतर छिपी हिंसा की है, जो सामान्यता के मुखौटे में ढकी रहती है। यहाँ सबसे डरावनी बात घटनाएँ नहीं; बल्कि उनका सहज स्वीकार है। कथा यह दिखाती है कि शोषण केवल क्रूर लोगों से नहीं होता, बल्कि उन लोगों से भी होता है जो स्वयं को सभ्य मानते हैं। गोश्त यहाँ केवल मांस नहीं, बल्कि वह वस्तुकरण है, जिसमें इंसान बदल जाता है।

भेड़िये इस संग्रह की सामाजिक चेतना को स्पष्ट रूप से प्रकट करती है। लघुकथा के रूप में यह इसलिए प्रभावशाली है; क्योंकि यह किसी वैचारिक वक्तव्य या राजनीतिक आरोप में नहीं बदलती। भेड़िये यहाँ सत्ता, अवसरवाद और अमानवीयता के प्रतीक हैं; लेकिन वे किसी बाहरी शत्रु की तरह प्रस्तुत नहीं होते। वे व्यवस्था के भीतर मौजूद हैं, सफल हैं और स्वीकार्य हैं। यही स्वीकार्यता इस लघुकथा को भयावह बनाती है। लघुकथा का प्रभाव यहाँ किसी चौंकाने वाले अंत में नहीं, बल्कि इस पहचान में है कि अमानवीयता कितनी सहज हो चुकी है।

पेंडुलम इस संग्रह की सबसे संतुलित और सबसे यथार्थपरक लघुकथाओं में से एक है। यह कथा आधुनिक पारिवारिक जीवन के उस द्वंद्व को पकड़ती है, जिसमें व्यक्ति सही और ग़लत के बीच नहीं; बल्कि दो सही मानी जाने वाली ज़िम्मेदारियों के बीच फँस जाता है। माँ और पत्नी के बीच झूलता हुआ पुरुष कोई असामान्य चरित्र नहीं है। वह समकालीन समाज का प्रतिनिधि है। लघुकथा यहाँ किसी निर्णय की ओर नहीं बढ़ती, बल्कि उस अनिर्णय को ही कथा का केंद्र बनाती है। यही लघुकथा का वास्तविक साहस है—जीवन की जटिलता को सरल बनाने से इनकार करना। कुछ कथाओं का व्यंग्य अत्यंत प्रभावी और तीक्ष्ण है, जो पाठक को विचलित नहीं करता, बल्कि सोचने का एक सही अवसर देता है

प्रदूषण केवल पर्यावरणीय संकट की लघुकथा नहीं है। यह नैतिक और मानसिक प्रदूषण की भी कथा है। लघुकथा में बाहरी प्रदूषण से अधिक आंतरिक प्रदूषण पर ध्यान केंद्रित किया गया है—जहाँ व्यक्ति अपने ही कर्मों के परिणामों से मुँह मोड़ लेता है। लघुकथा का अंत किसी समाधान की ओर नहीं जाता, बल्कि उस विडंबना पर रुकता है कि समस्या को पहचानने के बाद भी उसे स्वीकार नहीं किया जाता।

नपुंसक‘ नैतिक निष्क्रियता की लघुकथा है। यह कथा किसी व्यक्ति को खलनायक घोषित नहीं करती, बल्कि उस स्थिति को सामने रखती है, जहाँ व्यक्ति अन्याय को पहचानते हुए भी हस्तक्षेप नहीं करता। लघुकथा का प्रभाव इस बात में है कि यह पाठक को पात्र से अलग खड़ा नहीं होने देती। पाठक स्वयं को उस स्थिति में देखता है और असहज महसूस करता है। यही असहजता लघुकथा का उद्देश्य है।

टेक इट ईज़ी जैसी लघुकथा ईमानदार व्यक्ति की नैतिक विवशता को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यहाँ नायकत्व का कोई रोमांटिक या आदर्शवादी रूप नहीं है। यहाँ एक साधारण अधिकारी है, जो सही को सही मानते हुए भी ग़लत के आगे झुकने को विवश है। उसका संघर्ष व्यक्तिगत न होकर, संस्थागत है। यह कथा इस तथ्य को उजागर करती है कि आधुनिक व्यवस्था में नैतिकता अब मूल्य नहीं, बल्कि जोखिम बन चुकी है।

जहाँ के तहाँ जड़ता की लघुकथा है। यह कथा गति के भ्रम को तोड़ती है। पात्र चलता हुआ दिखाई देता है; लेकिन वास्तव में वह वहीं का वहीं है। लघुकथा यहाँ किसी बड़े दर्शन का सहारा नहीं लेती; बल्कि एक छोटी-सी स्थिति के माध्यम से यह दिखा देती है कि परिवर्तन केवल बाहरी गतिविधि से नहीं आता। यह लघुकथा आधुनिक जीवन की उस स्थिति को पकड़ती है जहाँ व्यस्तता को प्रगति समझ लिया गया है।

शासक और शासित लघुकथा सत्ता की उस सूक्ष्म संरचना को पकड़ती है, जो सार्वजनिक नहीं; बल्कि घरेलू और मानसिक स्तर पर कार्य करती है। माँ द्वारा बच्चे को जबरन दूध पिलाने का दृश्य साधारण प्रतीत होता है; लेकिन लघुकथा का प्रभाव वहीं से शुरू होता है, जहाँ बच्चा ‘बाबा’ के भय से दूध पीने को मजबूर होता है। यहाँ सत्ता का चेहरा न तो क्रूर अधिकारी है, न तानाशाह—वह अनुपस्थित होकर भी सर्वाधिक प्रभावी है। लघुकथा का मूल तत्त्व ‘संकेत’ यहाँ अत्यंत सशक्त है। ‘बाबा’ का न दिखना ही उसका सबसे बड़ा आतंक बन जाता है। यह लघुकथा सिद्ध करती है कि सत्ता हमेशा दंड से नहीं, भय की स्मृति से संचालित होती है। भाषा संयमित है, दृश्य एक है और प्रभाव गहरा—यह लघुकथा की कसौटी पर खरी उतरती है।

उपभोक्तावाद और आधुनिक जीवन की आंतरिक रिक्तता पर आधारित कथाएँ इस संग्रह को समकालीन संदर्भों से दृढ़ता से जोड़ती हैं। कस्तूरी मृग और मृग– मरीचिका जैसी कथाओं में भौतिक सुखों की निरर्थक दौड़ को अत्यंत सूक्ष्मता और गहराई से चित्रित किया गया है। पात्र सुविधाओं, साधनों और उपलब्धियों से घिरा हुआ है, फिर भी भीतर एक रिक्तता है, जिसे कोई वस्तु नहीं भर पाती। लेखक इस रिक्तता को दार्शनिक शब्दजाल में नहीं; बल्कि जीवनानुभव की भाषा में व्यक्त करता है, जिससे यह रिक्तता पाठक की अपनी अनुभूति बन जाती है।

गुठलियाँ जैसी कथा स्त्री-विमर्श को एक नया आयाम देती हैं, जिसकी दृष्टि जटिल और बहुआयामी है। यहाँ स्त्री केवल पुरुष-सत्ता की पीड़िता नहीं; बल्कि परंपरा, संस्कार और सामाजिक मूल्यों की वाहक भी है। वह अनजाने में उन्हीं संरचनाओं को आगे बढ़ाती है, जो अंततः उसके शोषण का कारण बनती हैं। यह दृष्टि लेखक को एकरेखीय विमर्श से बचाती है और स्त्री-अनुभव की जटिलता को अधिक प्रामाणिक रूप में सामने लाती है।

डरे हुए लोग संग्रह की सबसे मार्मिक लघुकथाओं में से है। किसान की चुप्पी, उसका झुका हुआ सिर और सरकारी व्यक्ति से आँख न मिला पाना—ये सब मिलकर एक ऐसी संवेदना रचते हैं, जो शब्दों से परे है। यह कथा किसी विद्रोह का आह्वान नहीं करती; बल्कि उस थकान को दर्ज करती है, जहाँ आदमी बोलने से पहले ही हार मान लेता है। यहाँ पाठक को किसान पर तरस आता है; लेकिन उससे भी अधिक उस व्यवस्था पर दुःख होता है, जिसने डर को जीवन का स्थायी भाव बना दिया है।

गुबार में संवेदना और विडंबना साथ-साथ चलती हैं। सूखा किसान के लिए विनाशकारी है; लेकिन अधिकारी की पत्नी के लिए सुविधा और अवसर। यह विरोधाभास किसी कटाक्ष से नहीं; बल्कि सामान्य बातचीत से उभरता है। पाठक को यहाँ किसी संवाद पर हँसी नहीं आती; बल्कि भीतर एक असहज चुप्पी भर जाती है। संवेदना इस बात में है कि किसान की पीड़ा किसी को चौंकाती नहीं—वह अब सामान्य हो चुकी है।

जनता का खून में पेट्रोल का मानवीकरण संवेदना को एक नए स्तर पर ले जाना है। पेट्रोल शिकायत करता है, थकान महसूस करता है और समझे जाने की इच्छा रखता है। यह पढ़ते हुए पाठक को हँसी नहीं, बल्कि एक अजीब-सी ग्लानि होती है। निर्जीव वस्तु में भी संवेदना भरकर लेखक यह संकेत देता है कि जब व्यवस्था इतनी निर्दय हो जाए, तो चीज़ें भी मनुष्य से अधिक संवेदनशील लगने लगती हैं।

 वापसी लघुकथा की संवेदना चिल्लाती नहीं; बल्कि ये स्मृति की पीड़ा है। पुल निरीक्षण के समय पुरानी स्मृतियाँ किसी आत्मस्वीकृति में नहीं बदलतीं, लेकिन पाठक महसूस करता है कि पात्र अपने अतीत से भाग नहीं पा रहा। यहाँ संवेदना पछतावे में नहीं; बल्कि उस अधूरे बोध में है, जो पल-पल पछतावे से व्यक्ति को व्यथित रखता है।

मर मिटने का आनंद जैसी प्रतीकात्मक लघुकथा में भी संवेदना कोमल और शांत है। पीली घास का कुचला जाना किसी शोक में नहीं बदलता, बल्कि एक स्वीकार में ढल जाता है। यह स्वीकार पाठक को भावुक नहीं करता; बल्कि उसे जीवन की नश्वरता और उपयोगिता पर सोचने को मजबूर करता है। यहाँ संवेदना दया में नहीं, बल्कि समझ में है।

राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र पर आधारित कथाओं में लेखक का व्यंग्य अत्यंत सूक्ष्म, संयमित और परिष्कृत है। सोडावाटर में भ्रष्टाचार-विरोधी जाँच की प्रक्रिया को एक साधारण किंतु अत्यंत सार्थक प्रतीक में समेट दिया गया है। प्रारंभिक उफान धीरे-धीरे शांत हो जाता है और यही शांति व्यवस्था की सबसे बड़ी विजय बन जाती है। यह कथा उस तंत्र को उजागर करती है, जहाँ विरोध भी व्यवस्था का अंग बनकर निष्प्रभावी हो जाता है। लेखक बिना किसी घोषणात्मक आरोप के पूरी प्रणाली को पाठक के सामने अनावृत्त कर देता है।

 आइसबर्ग में दंगे केवल बाह्य हिंसा नहीं; बल्कि भीतरी भय, असुरक्षा और आत्मरक्षा की मानसिक संरचना के रूप में उपस्थित होते हैं। साधारण व्यक्ति द्वारा अपनी पहचान छिपाने की रणनीति यह दर्शाती है कि सांप्रदायिकता कैसे मनुष्य को नैतिक समझौतों के लिए विवश कर देती है। यहाँ कोई घोषणा नहीं, कोई सीधा वक्तव्य नहीं—मात्र डर है और वही डर इस लघु कथा का केंद्रीय स्वर बन जाता है।

समग्र रूप से इस संग्रह की संवेदना आक्रोशात्मक नहीं, बल्कि शांत और गहरी है। लेखक न तो पाठक को रोने के लिए उकसाता है, न ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए बाध्य करता है। वह केवल जीवन की उन स्थितियों को सामने रख देता है, जहाँ मनुष्य भीतर से टूटता है, लेकिन बाहर से सामान्य बना रहता है। यही संवेदना आधुनिक लघुकथा की पहचान है।

ये लघुकथाएँ पढ़कर पाठक को यह एहसास होता है कि दुख हमेशा असाधारण नहीं होता—वह अक्सर बहुत साधारण होता है, इतना साधारण कि हम उसे पहचानना ही भूल जाते हैं। यह संग्रह उसी भूले हुए दुख को शब्द देता है। बिना शोर के, बिना घोषणा के—केवल एक शांत, गहरी मानवीय संवेदना के साथ।

भाषा और शिल्प के स्तर पर भी विचार करें, तो यह कथा-संग्रह अत्यंत अनुशासित सुगठित और भाषा के स्तर पर मानकीकृत है। लेखक को अपनी संरचनात्मक सीमाओं का विशेष ज्ञान है; इसीलिए वे उन्हीं के भीतर गहन अर्थ संकेत रचते है। भाषा सरल सहज और परिष्कृत है अपेक्षाकृत कठिन और मानकीकृत शब्दों का प्रयोग यहाँ दिखावे के लिए नहीं; बल्कि वैचारिक गहराई को सूक्ष्मता से व्यक्त करने के लिए हुआ है।

इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह करुणा को भावुकता में परिवर्तित नहीं होने देता। यहाँ पीड़ा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पीड़ा की स्वीकृति और समझ है। लेखक स्वयं को किसी नैतिक ऊँचाई पर स्थापित नहीं करता; वह उसी समाज का हिस्सा है, उसी विडंबना का सहभागी है, जिसका वह चित्रण करता है। यही आत्मसजग ईमानदारी इस साहित्य को गहरी विश्वसनीयता प्रदान करती है।

सांप्रदायिकता पर आधृत कथाएँ इस संग्रह को गहरी वैचारिक दृष्टि प्रदान करती हैं। ‘

इस संग्रह से गुजरते हुए यह अनुभूत होता है यह लघुकथा–संग्रह अपने समय की नैतिक थकान, सामाजिक पाखंड, संरचनात्मक हिंसा और मानवीय विवशताओं का एक अत्यंत संवेदनशील, जीवंत और मार्मिक दस्तावेज़ है। यह कथा न तो सांत्वना के लिए लिखी गई है, न ही समाधान प्रस्तुत करने के लिए; बल्कि यह वह लेखीय कसौटियाँ हैं, जो पाठक को अपने समय समाज और स्वयं से साक्षात्कार करने के लिए विवश करती हैं। यही इस लघुकथा- संग्रह की शक्ति है और दीर्घकालिक प्रासंगिकता का आधार भी यही है।

समग्र रूप से यह संग्रह एक ऐसा अनुभूति है जिसे शीघ्रता से पढ़कर समाप्त नहीं किया जा सकता। हर कथा पढ़ने के बाद रुकने का मन करता है, थोड़ा ठहरकर सोचने का मन करता है। यह ठहराव ही इन कथाओं की असली उपलब्धि है। वे पाठक को अपनी गति धीमी करने के लिए मजबूर करती हैं और आज के समय में यह अपने आप में एक बड़ा साहित्यिक हस्तक्षेप है।

अंततः कह सकते है कि यह लघुकथा-संग्रह संवेदनात्मक संस्पर्श, भावुकता और तार्किक विवेक—तीनों का एक संतुलित और परिपक्व संयोजन प्रस्तुत करता है। इसकी सीमाएँ भी इसकी शैली से ही उत्पन्न होती हैं और इसकी ताकत भी। साहित्य को आत्म-परीक्षण और सामाजिक चेतना का माध्यम मानने वाले पाठकों के लिए यह संग्रह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह संग्रह भीतर कहीं चुपचाप बैठ जाता है और समय-समय पर बिना बुलाए सामने आकर सवाल पूछता है। शायद यही अच्छे साहित्य की सबसे विश्वसनीय पहचान है।

-0- डरे हुए लोग (लघुकथा-संग्रह ): सुकेश साहनी, मूल्य सजिल्द : 160.00 रुपये, पृष्ठः 128,द्वितीय संस्करण 2010,  ISBN: 978-81-7408-387-6, अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली- 110 030

 

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