गढ़वाली अनुवाद; डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
पूरू तलाक, होणा बाद बि ऊँन अप अपड़ी पैलि जननि कि क्वी बि चीज घौर म नि रैंण दे। वींक पुरणां कपड़ा बि काम वळि तैं दे देंन। जौं फोटु माँ वा छै, उँ का बि कत्तर – कत्तर कैरियालि छा।
फीर बि इतगा सावधान रौण क बाद बि चुफ्ला म लगण वाळि उँकि जननि कि फुंदणी पलंग क गद्दों क बीच म दबी रै गे।
एक दिन पलंग झटकदि बगत या फुंदणी भ्वीं मुँ पड़ी। ईं तैं वू आस्चर्य सि कुछ देर देखणा रैन। फीर कै चचगट्ठा की लासै की तराँ वीं तैं चिमटा म भोरि क घौर सि भैर फेंकण गेन।
या फुँदणी वूँन गळी म फेंकि दे, त गळि क कुकुरू न वीं तैं गिच्चा म भरी दे। वु यीं तैं खींचि-खींचि क कत्तर – कत्तर कन्न लगि गेन।
बैख ये दृस्य तैं कुछ देर तलक देखणा रैन। फीर वूँ तैं खब्न्नि क्य सूझी, जु वूँ कुकुरू तैं धुत्कारि तैं वूँका गिच्चा बिटि वीं फुंदणी क कत्तर छीनण लगी गेन।