
व्हाट्सएप पर लगातार आ रहे नोटिफिकेशन ने मेरा घ्यान खींचा। पारिवारिक समूह में ढेर सारी तस्वीरें हैं, उन सब कजिन्स की जो मेरे ही शहर में रहते हैं, खाना-पीना, मौज-मस्ती वे सभी बचपन के पल पुनर्जीवित किए गए हैं जिनसे गुजरते हुए हम सभी एक साथ बड़े हुए हैं।
इस आयोजन में सिर्फ़ मैं और मेरी छोटी बहन दिखाई नहीं दे रहे। आनंद मैया तो लंदन में रहते हैं, वे भी शामिल हैं।
क्या वज़ह है जो हमें इस आयोजन का हिस्सा नहीं बनाया गया, आनंद भैया तो जब भी आते हैं, हर बार मुलाकात करते ही हैं। कारण जानने के लिए आनंद भैया को ही फ़ोन लगाया।
‘‘कैसे हो अमित? भैया! आप कब आए, कुछ बताया ही नहीं?’’
‘‘अरे एक फैमिली फंक्शन अचानक तय हुआ, सबका आग्रह इतना ज़्यादा था कि आना ही पड़ा।’’
‘‘फैमिली फंक्शन…भैया! आप शायद भूल रहे हैं कि मैं भी इसी फैमिली का हिस्सा हूँ।’’
‘‘बुरा मत मानों अमित। दरअसल ये क्लोज फैमिली फंक्शन था, मतलब सिर्फ़ सगे भाई-बहन।’’
‘‘मैया! बचपन से साथ रहे हैं, तब तो हम सब एक हुआ करते थे, अब ये चचेरे, ममेरे कैसे हो गए?”
‘‘अरे तब हम बच्चे थे, अब सब समझदार हैं, अगली बार आऊंगा तब ज़रूर मिलेंगे। अभी जल्दी में हूँ। कल सुबह-सुबह हम सब फैमिली पिकनिक पर जा रहे हैं।
‘‘भैया…’’ शायद आँखों के डबडबाने से मेरी आवाज़ में भी नमी आ गई है।
इसी बात का फायदा उठाते हुए भैया ने कहा, ‘‘अब तुम अभी तक उसी टाइम जोन में अटके हो तो हम क्या करें? समय के साथ सब बदल जाता है, सबकुछ।’’
कॉल कट करते ही मैंने फैमिली ग्रुप से एग्जिट मार दिया।
दीवार पर लगी बंद घड़ी अचानक टिक-टिक करते हुए समय के साथ चलने लगी…!
| -0-वर्षा गर्ग , A/202,चारकोप आविष्कार, प्लॉट नं 119, सेक्टर_6,चारकोप,हरियाणा भवन के नजदीक, कांदिवली(पश्चिम),मुम्बई 400067 |