करीब दो घंटे से मैं यहाँ छत पर रेलिंग के सहारे खङा हूँ । इस बीच एक बार पत्नी चाय का कप पकड़ा गई है जो हाथ में पकड़े पकड़े ही ठंडा गयी है । छत से धूप लगभग जा चुकी है । यहाँ मुँडेर पर कतरा भर धूप बची है, जो मेरे कंधों और सिर को गरमाए हुए है ,वरना पूरी छत इस समय ठंड के आगोश में हैं । नीचे सड़क पर किनारे किनारे उगे गुलमोहर का पत्ता पत्ता गिर चुका है । पत्र विहीन टहनियों वाले पेड़ बेहद उदास लग रहे हैं । जनवरी में अमूमन ऐसा ही होता है । हर साल पतझड़ इन पेङों का सब कुछ छीनकर इन्हें कंगाल बना देता है । कोहरे में लिपटे ये इसी तरह चुपचाप खड़े अपनी बेबसी पर आँसू बहाते दिखाई देते हैं । मानो नए कपङों का इंतजार करते करते बच्चे उदास होकर कोने में बैठ गए हो और वह कोने में उगी नीम मुझे अधफटे कपड़े पहने ठंड में ठिठुरती हर मंगल को मंदिर के सामने भीख माँगने के लिए खड़ी भिखारिन जैसी लगती है जिसकी मुट्ठी खाली है । सड़क इस समय सुनसान हो चली है ।
मैं चोर दृष्टि से सामने वाले घर की खिड़की पर नजर डालता हूँ । वहाँ अभी रोशनी की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही । न ही कोई हलचल हो रही है । यह मेरी दसवीं कोशिश है । करीब एक घंटा पहले सुहासिनी अपने बच्चों के साथ आटो से उतरी थी । मात्र पीठ ही दिखाई दी थी । सब एकदम चुप । पहले यह घर सुबह से शाम तक कहकहों से गुलजार रहता था । खिड़कियाँ खुली और रोशनचिराग । सुहासिनी के माथे पर बड़ी- सी रुपया साइज बिंदिया , होठों पर गहरे मैरुन रंग की लिपिस्टिक , दिपदिप करती सीमांतरेखा और एक से एक दामी साड़ियाँ । चेहरा चमकता रहता । अचानक दफ्तर से लौटते उमेश की कार जा टकराई थी पेड़ से और मिनटों में सब खत्म । सुहासिनी न रोई न चिल्लाई । बस चुप हो गयी । बिंदी सेंदुर सब पीछे छूट गए । कर्मकाण्ड निभाकर सब रिश्तेदार विदा हुए तो भाई जिद करके उसे और बच्चों को अपने साथ ले गया था । तब से बंद था यह घर । पूरे दस दिन बाद लौटी है सुहासिनी । पर कहाँ है , कैसी है , बस एक झलक देखना चाहता हूँ । न जी न , कोई उल्टी सीधी बात मन में न लाइए । मैं तो महज़ एक पड़ोसी के नाते उसे देख भर लेना चाहता हूँ । कोई वासना छोड़ , कोई लालसा भी मन में नहीं । हमेशा इस समय उमेश के इंतजार में दरवाजे पर खड़ी मिलती थी, तो देख लेता था । उसी तरह देखना चाहता हूँ । बीवी इस बीच कई बार चाय के लिए पुकार चुकी है । पर जा ही नहीं पा रहा । पैरों से सरदी चढ़नी शुरू हो चुकी है । जाना ही होगा । मैं बेमन से नीचे जाने के लिए मुड़ने से पहले एक बार फिर बंद खिड़की को देखता हूँ । खिड़की अभी भी बंद है ।
अचानक नीचे पत्नी की किसी से बातें करने की आवाजें सुनाई दे रही हैं । मन में एक किलक-सी उठी – अरे जिसे मैं यहाँ खोज रहा था , वह मेरे किचन में । लपकते हुए नीचे उतरता हूँ । तब तक वह जा चुकी है । पत्नी चाय का कप थमाती हुई सूचना देती है – सुहासिनी लौट आई है । दूधवाले के लिए पूछने आई थी । सुबह उसे दूध भिजवाना है । अचानक उसकी नज़र मेरे चेहरे पर पङी –आप भी न ,कुछ ज़्यादा ही सैंटी हो जाते हो । पतझड़ में गुलमोहर के पत्ते झड़ ही जाते हैं । देखना महीने भर में पहले जैसे हो जाएँगे ।
“पर पहले वाले पत्ते तो गए …।”
“कुछ कहा आपने?”
“मैंने ! नहीं।” मैं अपनी स्टडी की ओर मुड़ गया ,क्योंकि कुछ बातों का कोई मतलब नहीं होता ।