“सप्ताह के शुरू में भी भला कोई जाता है?”
“सप्ताह के मध्य में जाने का तो कोई तुक ही नहीं है।”
“सप्ताह के अंत में किसी को कहीं नहीं जाना चाहिए।”
मैं हर बार उसे यह सोचकर रोकता रहा कि दो दिन का समय मिल जाए, तो उससे वह कहूँ, जो कहना चाहता हूँ; पर जो कहना था, अनकहा रह गया। अंततः वह चली गई। मैं उसे स्टेशन पर छोड़ने गया। ट्रेन आने में अभी समय था। वह और मैं एक बेंच पर बैठे थे। पल भर के लिए उसने मेरा दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिया। मैं प्लेटफॉर्म को देखे जा रहा था, उसकी नज़र कहाँ थी, मुझे पता नहीं। ट्रेन आई, वह ट्रेन में चढ़ गई। मैंने उसे जाते हुए देखा। नहीं, मैंने उसे जाते हुए कहाँ देखा? मेरी आँखों में तो कोहरा जमा था, वह सर्दियों की सुबह थी न !
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