भीड़ में खड़ा एक आदमी चिल्लाया- “तुम जिन्दा हो?”
नेता मुस्कराया- “हाँ, तुम देख तो रहे हो… बोल रहा हू, चल रहा हू, जीत भी रहा
“हूँ।”
“नहीं, मैं कुछ और पूछ रहा हूँ।”
” तो पूछो।”
” क्या तुम्हारे भीतर इन्सानियत है?”
“वो बहुत महँगी पड़ती है, छोड़ दी।”
“ईमानदारी?”
“वो हारने वालों का गहना है।”
“सम्वेदना?”
” राजनीति में वो कमजोरी मानी जाती है।”
आदमी चुप हो गया।
भीड़ भी कुछ पल को सन्न।
फिर किसी ने धीरे से कहा- “तो तुम जिन्दा नहीं हो… एक चलती-फिरती लाश हो।”
नेता हँस पड़ा।
“तुम्हारी नज़र में सही हो सकता है, पर इस लोकतन्त्र में मुर्दे ही सबसे ज्यादा वोट पाते हैं।”
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