जब भी दरवाजे पर दस्तक होती, हम चारों भाई-बहन में से कोई न कोई भीतरी कमरे की खूँटी से पिताजी की कमीज लाने दौड़ पड़ता। हमारी सारी फुर्ती के बावजूद अक्सर पिताजी के कमीज पहनने से पहले मेहमान बैठक में पहुँच जाता और आधा दर्जन छेद वाली पिताजी की बनियान हमें शर्मिंदा कर देती।
पिताजी को तो पता नहीं क्यों शर्म आती ही नहीं थी, फटी बनियान- अँगूठा निकली जुराब मानो उनकी पसंदीदा पोशाक हो। मगर हम सभी धरती फटने और उसमें समा जाने वाली स्थिति में पहुँच जाते।
हम बहुत ग़रीब थे ऐसा भी नहीं था। पिताजी चपरासी से कनिष्ठ बाबू हो गए थे। मेरे जन्मदिन पर उन्होंने मुझे पूरे साढ़े छह सौ की महँगी वाली नई-नकोर साइकिल दिलाई थी। ऐसी साइकिल मोहल्ले में किसी के पास न थी। भाई साहब को तो ‘पाँच हज्ज़ार’ सालाना फीस देकर कलकत्ते से ट्रेनिंग कराई थी। लेकिन बारह रुपये की बनियान खरीदने में पता नहीं उन्हें क्या दर्द उठता था।
यही नहीं दफ्तर भी पैदल जाना, टाँका लगे जूते.. उफ्फ़।
सच कहूँ तो हम भगवान को मनाते थे कि हमारे लिए कोई स्टैण्डर्ड वाले पापा नहीं मिले थे क्या!
“पापा!…. पापा!” बिटिया की आवाज़ से आईने के सामने शर्ट पहनते मेरी तन्द्रा टूटी।
“हूँ!” मैंने जवाब दिया।
“पापा! हमारी सारी क्लास शैक्षिक भ्रमण पर जा रही है। हज़ार रुपये जमा करवाने हैं। प्लीऽऽज़।” बिटिया ने मेरा हाथ पकड़कर फुदकते हुए चिरौरी की।
“ठीक है”- मैंने ज़रा सोचकर कहा।
“मेरे पापा सबसे अच्छे”- वो खुश होती चली गई।
उसके चेहरे पर खुशी देख मुझे अच्छा लगा।
मैंने पर्स देखा। उसमें कुल बारह सौ साठ रुपये थे, और आज पच्चीस तारीख ही थी।
“देखा जाएगा। बच्चों के लिए ही तो कमा रहे हैं।” मैंने सोचा।
शर्ट के बटन बंद करते समय मेरी नज़र आईने की ओर गई, मेरी बनियान में तीन छेद झाँक रहे थे।
“अगली बार ले लेंगे,” -मैने सोचा।
लगा तस्वीर में पिताजी मंद-मंद मुस्कुरा रहे हों।