‘‘सर, दस-बीस शिकायतों में से आप अक्सर उन पर ध्यान देते हैं, जो अपने शिकायत पत्र में पुलिस वालों को अपशब्द बोलते हैं। उन्हें क्यों नहीं बोर्ड पर पिनअप करते हैं, जो खाकी की तारीफ में चार लाइन लिखकर थाने के गेट से लगे, आपके द्वारा लगाए उस खंभे पर टाँग जाते हैं। इसके बजाय एक शिकायती बॉक्स लगवा दीजिए सर। आते-जाते लोगों की नजर ऐसे पत्रों पर पड़ती है, तो खाकी की छवि और भी अधिक धूमिल होती है।’’ रिटायर होने के करीब पहुँचे कांस्टेबल ने अपना संदेह जाहिर किया।
‘‘अरे भई, थोड़ा थम जाओ, कितनी शंकाएँ इकट्ठी करके लाए हो। दस पंद्रह दिन रुक जाओ, फिर देखना।’’ थानाध्यक्ष ने समझाया।
‘‘सर, हमने पता किया, तो पता चला आप जिस थाने में भी पोस्ट किए गए, वहाँ आपने पब्लिक के लिए शिकायती खंभे की व्यवस्था की और हर जगह खाकी की बुराइयाँ लिखने वाली गुमनाम शिकायतों को ही तवज्जो दी। थाने के अंदर लगे बोर्ड पर भी उन्हीं पत्रों को तवज्जो दी। सर, कम-से-कम थाने के अंदर…। इधर तारीफ़-ही-तारीफ के कागज लहराएँगे, तो हमारी छवि उजली दिखेगी न सर!’’
‘‘मैं लोगों के बीच खाकी की छवि सुधारना चाहता हूँ दिखाना नहीं।’’
‘‘लेकिन भला-बुरा कहने वालों को प्राथमिकता क्यों और जिनको नजरों में छवि अच्छी बनी हुई है, उन बहुमूल्य पत्रों को दराज में बंद कर देना…! ऐसा क्यों सर?’’
‘‘समझ रहा हूँ कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। अपनी ही तारीफों के डंके पीटना कहाँ की इंसानियत। मैं जनता के मन में जमी खाकी की दागदार छवि को मिटाना चाहता हूँ। तुम इसे शिकायती खंभा कहने के बजाय ‘छवि सुधारक यंत्र’ भी कह सकते हो।’’ कहते-कहते थाने के गेट तक आ पहुँचे थे।
खंभे पर नजर गई तो एक ताजा-तरीन पत्र लहरा रहा था। जिस लिखावट में तीन दिन पहले के पत्र में तबीयत से गालियाँ लिखीं थीं, आज स्थिति उससे बिल्कुल उलट थी। लोग रुक-रुककर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे पत्र को पढ़ रहे थे।
बूढ़े कांस्टेबल की शिकायती आँखें अब उच्चतर स्वर में ‘जय हिन्द’ कहते हुए चमक रही थीं।
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