जुलाई 2026

देशचौखट के उस पार     Posted: July 1, 2026

दोपहर शहर की गलियों में धूप की तरह फैली हुई थी। सैन्य वाहन मोड़ से गुज़रा तो उसने अनायास गर्दन उठा ली। वही गली… वही नीम… वही घर जिसकी दीवारों पर कभी उसने अपने बच्चों की ऊँचाई के निशान बनाए थे।

ड्यूटी के बीच मिले कुछ क्षण थे उधार के, अधूरे।

साथ चल रहे जवान बाहर ही रुक गए। उसने हँसते हुए पानी माँगा। भीतर से उसकी पत्नी आई। पल्लू सँभालते हुए जैसे वर्षों से किसी अदृश्य अनुशासन को सँभाल रही हो। उसने एक-एक कर सबको पानी दिया। जब गिलास उसके हाथ तक पहुँचा, उनकी उँगलियाँ क्षण-भर को छुईं और वही क्षण भीतर कहीं बहुत गहरे टूटकर गिरा।

वह चाहता था बस एक बार उसके पीछे रसोई तक चला जाए। देखे कि चूल्हे पर क्या चढ़ा है। पूछे बच्चों ने खाना खाया या नहीं। दीवार की ओट में खड़े होकर दो पल पति हो ले… पर वर्दी के भी अपने संस्कार होते हैं। वे मन को चौखट से आगे नहीं बढ़ने देते।

वह मेहमानों की तरह दरवाज़े के पास बैठा रहा।

पत्नी भीतर-बाहर आती रही। उसकी चाल में हल्का डगमगाहट थी, जैसे कोई बहुत दिनों से अपने आँसू उठाए चल रहा हो। उसने पहली बार गौर से देखा, उसके बालों में सफ़ेदी चुपचाप उतर आई थी।

“सब ठीक है न?”

उसने धीमे से पूछा।

उसकी पत्नी सिर हिला दिया।

पर उस “हाँ” में इतना कंपन था कि उसका सैनिक होना अचानक बहुत छोटा पड़ गया। कुछ देर के लिए उसे लगा, सीमा पर खड़े रहना शायद आसान है, घर की देहरी पर खड़े रहना कठिन।

बच्चे भीतर कमरे में थे। शायद जानबूझकर बाहर नहीं आए। वे जानते थे पिता जब भी आते हैं, थोड़ी देर बाद फिर चले जाते हैं। बच्चों ने प्रतीक्षा से बचना सीख लिया था।

उसने गिलास नीचे रखा। आँखें एक बार पूरे आँगन पर फिराईं तुलसी, रस्सी पर सूखते छोटे कपड़े, दरवाज़े की उखड़ती पुताई… सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे घर नहीं, समय खड़ा हो।

कदम रुकना चाहते थे; पर उसे अचानक भय हुआ यदि कुछ देर और ठहर गया, तो भीतर वर्षों से बाँधा हुआ बाँध टूट जाएगा।

वह उठा। पत्नी पास आई।

उसने चाहा, उसे सीने से लगा ले, उसके काँपते कंधों पर अपना माथा रख दे, और कहे कि वह भी थकता है… पर उसने केवल उसके कंधे पर हाथ रखा। हल्के से दबाया और बाहर निकल आया।

फिर मुड़ गया।

गली से बाहर निकलते समय उसने पीछे नहीं देखा। उसे डर था-कहीं घर उसे रोक न ले।

वह जनता था कि कुछ रिश्ते मुड़कर देखने भर से बिखर जाते हैं और उस दिन पहली बार उसे लगा देश की रक्षा करते-करते कुछ सैनिक धीरे-धीरे अपने ही घरों से निर्वासित हो जाते हैं।

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