चौथा पुरस्कार

मस्ज़िद से निकलते ही उसकी नज़र आसमान में लहराती हुई कटी पतंग पर पड़ी. ट्रैफिक और भीड़ से बेपरवाह वह दौड़ पड़ा. निगाह पतंग पर अटकी थी. पतंग ने लंबा गोता खाया और एक आँगन में जा गिरी. आँगन…आँगन तो पड़ोस का था किंतु वह ठिठक गया. डरते हुए सोच रहा था कि वह पतंग उठाए या नहीं. उहापोह. कटी हुई पतंग हाथ में न हो तो भला मज़ा कैसा. पसोपेश में पड़ा वह गेट पर खड़ा था. हथेलियाँ पसीजी जा रहीं थी. होंठ शुष्क हो रहे थे. ललचाई आँखें पतंग पर गड़ी थीं. आँगन पहले सिर्फ़ आँगन था. परंतु अब वहाँ तो…दूसरे ही लोग आ गए थे. पहले वह बेधड़क उठा लाता था. गेंद, पतंग और आँगन में पड़े अमरूद. लेकिन अब… .
हिम्मत करके वह दबे पाँव आँगन में घुसा. और पतंग उठाते ही सरपट भागा. लेकिन गली के कोने पर जाकर वह फिर ठिठक गया. सामने से एक जुलूस नारे लगाता हुआ गुज़र रहा था. उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा. भय आँखों में तैर गया. उसने घबराकर झट से अपने सिर की टोपी उतार ली और दीवार की ओट में छिप गया. पता नहीं उसे क्यों लग रहा था कि उसने चोरी की है?
-शिवचरण सरोहा,संपर्क- ए- 107, शकूरपुर आनंद वास, दिल्ली-110034
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