कामवाली के साथ उसकी दस वर्ष की बेटी भी आती थी। काम में सहयोग करने के लिए नहीं, बल्कि गृहिणी से पढ़ने। बहुत होनहार थी। अच्छे नंबरों से पास होती थी। पढ़ाने में गृहिणी का भी समय निकल जाता था। कामवाली बड़ी कृतज्ञ रहती। गृहिणी जो काम कहती वह फ़ौरन कर डालती। वह गृहणी का हमेशा गुणगान करती रहती। मगर पता नहीं क्यों, उसके पति को मिर्ची-सी लगती। शायद उनका दुष्ट और ईर्ष्यालु अंतर्मन इन छोटे लोगों की संभावित तरक्की से जलता था।
एक दिन उसका रिजल्ट आया। एक बार फिर वह ऊँचे अंकों से उत्तीर्ण हुई थी। गृहिणी आह्लादित थी। मगर पति का मन कुढ़ रहा था। गृहिणी ने उत्साहित होकर उस बच्ची से पूछा, “बिटिया, तुम बड़ी होकर क्या बनोगी?”
वह असमंजस में पड़ गई और कुछ सोचने लगी। पति ने अभी नाश्ता और चाय सम्पन्न किया था। जूठे बर्तन वही पड़े थे। उन्होंने उस बच्ची को झिड़की लगाते हुए कहा, “अरी सुन, ये जूठे बर्तन उठाकर रसोईघर में रख दे! तनिक काम करना भी सीखा कर !”
बच्ची सहम-सी गई; मगर तभी कामवाली तमतमाते हुए तेजी से रसोईघर से बाहर निकल आई और उसने खुद जूठे बर्तन उठा लिये। जाते-जाते उसने बड़े जोश और हिम्मत से फुफकारते हुए कहा, “बीबीजी ने अभी पूछा कि बेटी, तुम क्या बनोगी ? तो सुन लो साहब ! मेरी बेटी डॉक्टर बनेगी, डॉक्टर! कामवाली नहीं..!!”
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