पति ने लगातार बड़बड़ाते हुए तीनों रोटियाँ खा ली थीं। हाथ धुलते वक्त भी जब नही रहा
गया, तो अपनी भड़ास निकाल ही ली– “आज पचास साल से बिना शिकायत किए तुम्हारी जली रोटियाँ खा रहा हूँ… दिखता न हो तो चश्में का नंबर बदल लो।”
पत्नी ने धीरे से थाली हटा ली। इतने सालों से एक ही बात सुन-सुनकर उसके कानों ने सुनना, जुबान ने कुछ कहना लगभग बंद कर दिया था।
रात काफी हो चुकी थी। पति को नींद नही आ रही थी। आज शाम सैर को जाते हुए बायाँ पैर थोड़ा मुड़ गया था। उस वक्त तो पता नही चला; पर अब दर्द से परेशान हो करवट बदल रहा था।
अचानक मुँह से आवाज़ निकलने ही वाली थी कि जाने कब बगल में सोई पत्नी मूव लेकर आ गई।
अचानक कमरे की हल्की रोशनी में नज़र पत्नी के हाथ पर पड़े छालों के निशान पर गई।छाले साफ दिख रहे थे। उसने सोचा- उसका ध्यान पहले क्यों नहीं गया। उसको पहली बार लगा- चश्मा बदलने की जरूरत तो उसको ही है।
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