सातवाँ पुरकार

बहुत साल बाद बदली होकर मास्टर जी करीब के गांव में आ पाये थे। मास्टर तो
पुराने थे, पर नये स्कूल में आने के कारण नये वाले मास्टर थे। बच्चे उन्हें ऐसे देखते जैसे
कि टोह ले रहे हों। वे कोशिश करते कि छात्रों को इस तरह पढ़ाएँ कि उन्हें लगे कि ये वाले
मास्टर जी कुछ अलग हैं। कुछ दिन छात्र उनसे खुलकर बातचीत करने में हिचकिचाते रहे,
इसलिए वे खुद उनसे ज्यादा बात करते। उनसे उनकी रुचियों एवं पसन्द पर बात करते। कुछ
हल्की बातों और चुटकुलों से कक्षा का माहौल तनावरहित बनाने की कोशिश करते। बच्चे
दांत निकालकर ठठा कर हंसते तो उन्हें अच्छा लगता। कुछ ही दिनों में उन्हें लगा कि अब
छात्रों ने उन्हें अपना लिया है। खुलकर पढ़ाई और बातचीत होने लगी। उनकी इच्छा होती कि
छात्र खुद बताएँ कि उनका पढ़ाया उन्हें क्या अच्छा लगा, क्या नहीं। जब खुद किसी छात्र ने
उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया तो उनके अंदर का कीड़ा कुलबुलाने लगा। एक दिन मास्टर साब
ने स्वयं बात छेड़ दी। बात चली तो गाँव – कस्बे से होते हुए परिवार – परिचय पर चली गई।
छात्रों और मास्टर साब के बीच की जो खाई थी, मिट गई। एक छात्र बोला –“सर, हमे पता है
कि आप किस गाँव के हैं।”
“अच्छा! और क्या जानते हो?” उन्होंने उत्सुकता पूर्वक पूछा।
“आप गाँव में नहीं शहर में रहते हैं।”
“और?”
“आप कितने भाई हैं.”
“अच्छा..” वे हौले से मुस्कराए।
एक छात्र बोला –“हम लोगों को आपकी जाति भी पता है।”
उन्हें हल्का झटका लगा। उन्होंने अपने नाम के आगे – पीछे कोई जाति सूचक उपसर्ग –
प्रत्यय लगाया नहीं था। फिर भी उन्होंने पूछा- “और?”
“पहले आप बहुत गरीब थे।“
“अच्छा…।”
“आपके पिता जी शराब पीते थे….।”
मास्टर साब को ऐसा लगा कि उनके कान गर्म हो गये। तभी एक छात्र ने कहा –“और आप
की दूसरी शादी हुई है।”
मास्टर साब के कान में सीटियाँ बजने लगी। पर खुद को सँभालकर पूछे –“इतना सब कैसे
जान गए आप लोग?”
“गाँव में सब लोग बात करते हैं।”
“मेरे बारे में?”
“हाँ।“
“और जो मैं पढ़ाता हूँ, उस पर भी कोई चर्चा होती है?”
“…….”
सब छात्र एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
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