
रमेश का मन आज सुबह से ही कच्चा- पक्का हो रहा था आँखों में कई -कई बार पानी उतर आ रहा था। हो भी क्यों न, आज वह अपनी नौकरी के पैंतीस साल पूरे कर रिटायर होने जा रहा था। उसे संतोष इस बात का था कि उसने अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी से निभाई थी। दुख इस बात का था कि आज के बाद उसे करने को कुछ काम न रहेगा।
उसके लिए आयोजित विदाई समारोह में ऑफिस के कर्मचारी बारी-बारी से आकर उसके सम्मान में दो शब्द कह रहे थे, तो वही रमेश अपने अतीत में डूब- उतरा रहा था।
पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद, अनुकंपा नियुक्ति के अंतर्गत उसे चपरासी की नौकरी मिली थी। ऑफिस जाना तो महज उसकी औपचारिकता थी। जो महीने के आखिरी दिन पगार लेने तक की ही थी। महीने के बाकी दिन वह बड़े साहब के बंगले पर ड्यूटी में रहता था। घर के बाहर हो या घर के अंदर सारे काम उसी के सुपुर्द रहते थे, जिन्हें वह पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाता था।
अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी तंद्रा भंग हुई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आया।
“अब हमारे बड़े साहब रमेश के लिए दो शब्द कहेंगे। “- उद्घोषक के कहने के साथ, बड़े साहब ने मोबाइल पर बात जल्दी खत्म कर, माइक को हाथ में लेकर कहना शुरू किया।
“दिनेश हमारे लिए महज कामगार ही नहीं बल्कि हमारे घर का सदस्य रहा है।” -सुनकर सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा तो वहीं दूसरी ओर रमेश को झटका-सा लगा।
“दिनेश हमारे लिए तन -मन से पूरी तरह समर्पित रहा है। और हर जिम्मेदारी को निष्ठा से निभाता रहा है। “- बड़े साहब ने कहना जारी रखा।
सुनकर रमेश की आँखों में सैलाब उमड़ आया जिसे वह रोक न सका और
“साब जी,…आज तो आप कम से कम मुझे मेरे असली नाम से पुकार लेते। ” घरघराती आवाज में कह रमेश फफक- फफक कर रो पड़ा।
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