गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
“पैंतीस बरसै नौकरी क बाद बि न क्वी क़द्र च न क्वी इज्ज़त। यु बि साले क्वी ज्यूण च? याँ से अच्छु त मौत इ ऐ जाउ, सरु मुंडरू इ ख़त्म ह्वे जाउ।” अपडू स्कूटर पाळ पर चिबटै कि खडू करिक ससुरजी बरड़दु-बरड़दु घौरा भितर ऐन।
सच त यु छौ कि आजौ दिन इ अभागी रै ससुर जी थैं। सुबेर घौर बिटि काम पर जांणों थैं निकळिंन त रस्ता माँ स्कूटर ख़राब ह्वे ग्याई, सुबेर-सुबेर क्वी मकैनिक भी नि मिली त लगभग तीन मील तक मुस्किल से स्कूटर थैं लसोड़ी क कारख़ाना तकैं पौंछिन। जाँदु इ वे नयूँ औफिसर बिना कुछ सुण्याँ ससुरजी का देर म आँण पर वूँ पर खिजे बि च अर नौकरी बिटि निकाळणै कि धमकी बि दे छै। दुफरा म पता चलि कि जातरा पर जाणा वास्ता उंकी छुट्टी मंज़ूर नि ह्वाई। यु बि ना अपड़ा छुट्टा नौंना क दाखिला का वास्ता जु लोन की अर्जी दिइँ छै, वा बि नामंजूर ह्वै ग्याई। ऊंकू खांणौ बि आज डब्बा बिटी भैर नि निकलि़, अर दिन म खाणा क समैं वु बीड़ी पर बीड़ी फुकण पर लग्याँ छा।
“हे जी, पांणी।” ससुरजी थैं देखदु इ ऊंकी ब्वारिन पाँणी कु गिलास ऊंका सामणि रखदी बगत बोली।
“ना ब्वारी मि तैं नि चैंदु, लि जावा उठैक।” ससुराजी का माथा पर कि लकीर हौर गैरी ह्वे गे छाई।
“इतगा परेसान किलै छाँ, तब्यत त ठीक च न? क्य ह्वाई तुम थैं ?” सासु जी बि कमरा म ऐ गेन।
“कुछ नी ह्वे मि थैं, बस तुम लोग चलि जावा इख बटि।” ससुरा जी न उँ थैं उँगळिन भैरौ कु रास्ता दिखैकि बोलि।
“जी, वु आपौ लोन कु क्य ह्वाँई?” स्थिति का बारा माँ अनजाण छुट्टा नौना न कमरा म ऐ कि पूछि।
जवाब म ससुर जी न वीं थै खूब घूरिक देखी, वूंकु यु रूप देखिक सबुन वुख बिटि जांण इ ठिक समझी। बीड़ी सुलगैक वु फीर बड़बड़ाण लगि गेन:“यु ज्यूँण च कि साला नरक?” कमरै कि पाळयों कु पिंगळु रंग धीरू-धीरे वूं का मुख पर पर उतन्नू छौ अर वु टक लगै कि पाळयों थैं घूरण पर लग्यां छां। जन कि ज्वाप पोड़ी गे ह्वाऊ पूरा भितर फैलि गे छौ, तबरी छुट्टी- छुट्टी पैज्यों की छनछन भितर गूँजण लगी गे।
“दादा, दादा जी!!”
यूँ सब्दु न वूँ कु ध्यान टुटि गे, तीन बरसै की नातींण अचाणचक वूंका टाँगडौं पर लपटे अर ससुरजी का माथा म लकीर कम हूँण लगी गेन।
“अले… ले… ले… ले! मेली गुगली-मुगली! मेली म्याऊँ बिराळी ! कख चली गे छै तु? दादा जी कब बिटि त्वै ढूँढण लग्यां छा।” छुट्टी सि नतिण थैं उठै क वु प्वथलै की तरां चुंच्याँण लगि गे छा। नतींणन बि अपडू मुण्ड उंका कांधा म धैरियाली। अब वूँका मुक क पिंग्ळा रंग परैं नतणी की झगुली का गुलाबी रंग कि रंगत चढ़ण सुरू ह्वे ग्याई। लाड करिक वीं का माथा पर भुक्कि पे क वूँन ब्वारी थैं धै लगाई, “एक कप गरम-गरम चा त पिलै द्या ब्वारी…ऽ…।”
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