
सभागार भरा हुआ था। चर्चा का विषय था— “बदलते समय में खोती हुई मानवीय संवेदनाएँ।”
मंच पर शहर की एक प्रतिष्ठित और प्रबुद्ध महिला अपने प्रभावशाली शब्दों में बोल रही थीं।
“आज तकनीक बढ़ रही है, सुविधाएँ बढ़ रही हैं; लेकिन मनुष्य की संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं। लोग अपने मोबाइल, अपने काम और अपनी व्यस्तताओं में इतने उलझ गए हैं कि उन्हें यह तक पता नहीं रहता कि उनके पड़ोस में कौन रहता है। अपनी ही सोसाइटी में क्या हो रहा है, आसपास किस तरह के लोग रह रहे हैं—इसकी जानकारी भी लोगों को नहीं होती।
लेकिन मैं ऐसी नहीं हूँ। मैं अपने आसपास के वातावरण को बहुत ध्यान से देखती-समझती हूँ। अपनी सोसाइटी की छोटी-छोटी बातों पर भी मेरा ध्यान रहता है। मैं यह भली-भाँति जानती हूँ कि किसी भी परिस्थिति में सबसे पहले हमारा पड़ोसी ही हमारे काम आता है।”
सभागार में बैठे लोग ध्यान से सुन रहे थे। कुछ सहमति में सिर भी हिला रहे थे।
वह आगे बोली—“मैं तो अपने जीवन में हमेशा यही प्रयास करती हूँ कि सबके साथ मिल-जुलकर रहूँ। किसी के सुख-दुख में शामिल होना ही असली मानवीयता है। हमारी सोसाइटी के लोग जानते हैं कि मैं सबके साथ कितना आत्मीय व्यवहार रखती हूँ। उदाहरण के लिए—”
उन्होंने सामने बैठे एक व्यक्ति की ओर इशारा किया और मुस्कुराकर बोलीं—“जैसे हमारे गौतमजी, जो कि मेरी सोसाइटी में ही रहते हैं और मेरे पड़ोसी भी हैं। ये भली-भाँति जानते हैं कि मैं हमेशा सबके साथ खड़ी रहती हूँ। कहीं भी किसी को कोई परेशानी होती है, तो मैं सबसे पहले दौड़कर पहुँचती हूँ। है न, गौतमजी?”
सामने बैठे सज्जन धीरे- से खड़े हुए,“अरे क्या मैडम! मेरा नाम गौतम नहीं है… मेरा नाम दिनेश है। मैं आपका सबसे नज़दीक का पड़ोसी हूँ और आप मेरा नाम भी ठीक से नहीं जानतीं!
सभागार में बैठे लोग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। कई चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई। कुछ धीमे-धीमे ठहाके भी सुनाई दिए।
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