अक्तुबर 2026

देशक्षण -अधिकोष     Posted: October 1, 2026

चौथा पुरस्कार

जब शुभा को उसकी सहेली ने अखबार में एक इश्तहार दिखाते हुये बताया कि,  शहर में नया बैंक खुला है, “क्षण-अधिकोष”।

लोग उसमें अपनी फुर्सत के घंटे जमा कर सकते हैं, और बुढ़ापे में उन्हें निकाल कर आराम से खर्च कर सकते हैं।

अब शुभा ने बैंक जाकर देखा तो यह बिल्कुल सच बात थी। मैनेजर से बात करने पर मैनेजर ने उसे एक रसीद दी जिस पर लिखा हुआ था, “सुखमय जीवन साँझ”।

शुभा ने पहली पर्ची, “विश्व भ्रमण हेतु”। इसके लिये उसे एक महीने यानि कि लगभग 720 घण्टे जमा करने पड़ते। यह सोचकर उसने खुद से कहा, “नहीं-नहीं, सारा समय यहीं जमा कर दूँगी तो फिर पति का बच्चों और नाती पोतों के लिये क्या बचेगा?”

फिर उसने कुछ सोचा और नौकरी, बच्चे, घर, ससुराल- मायके वालों के लिये, रोज़ थोड़ी-थोड़ी फुर्सत काटकर बैंक में जमा करती रही। 

इस उम्मीद के साथ कि, अपनी माँ-दादी जैसे तरसना नहीं पड़ेगा बुढ़ापे में खूब जी भर कर जीऊँगी।

समय का पहिया चलता रहा। शुभा के बाल सफ़ेद हो गये, बैंक में रसीदें बढ़ती रहीं।

एक दिन डॉक्टर ने कहा, “अब आपको अपने लिये समय निकालने की ज़रूरत है।”

शुभा मुस्कुराई, “वो तो ढेर सारा जमा है, निकाल लूँगी।”

वह पहली बार जमा करने नहीं बल्कि समय निकलने के लिये बैंक पहुँची।”

 रिकॉर्ड देखते हुए क्लर्क बोला, “माता जी, आपके खाते में जमा घंटे बहुत हैं, लेकिन… आपके नाम पर एक भी स्वयं के लिए चिह्नित नहीं है।”

शुभा चौंक गई, “मतलब?”

क्लर्क ने शांत स्वर में कहा, “मतलब यह कि, आपने जितनी फुर्सत के पल जमा किये हैं, वो हमेशा किसी न किसी के साथ बिताने के लिये जमा किये हैं। आपके अपने लिये तो एक सेकेंड भी जमा नहीं है। पति की चिंता, बच्चों का समय, ऑफिस की थकान, सारी रसीदों में यही सब है, आप चाहें तो चेक कर लें।”

“पर मुझे अभी समय की बहुत जरूरत है।”

क्लर्क ने कुछ सोचते हुये कहा, आपने जिनके लिये अपना समय जमा किया अगर वो लोग अपना समय आपको दे दें तो उसमें से कुछ प्रतिशत काटकर आपको समय मिल सकता है। शुभा के चेहरे पर उम्मीद की एक किरण लहराई।

उसने एक-एक करके उन सबको कॉल किया जिनके लिये अपने जीवन का सारा समय खर्च किया था। पर कुछ ने बहाने बनाये और कुछ ने दो टूक जवाब दे दिया।

शुभा बिना कुछ कहे बैंक से बाहर निकली। हवा ठंडी थी, सड़क खाली।

उसने मुट्ठी में रसीदें कसकर भींच लीं और खुद से कहा, “जब हम जिंदगी के मूल को नहीं जीते तो उसका ब्याज भी नहीं मिलता।”

-0-पता : पूजा अग्निहोत्री W/O श्री प्रदीप अग्निहोत्री, रूम नंबर- 1236, उर्जानगर ‘C’ ब्लॉक, बिजुरी, अनूपपुर (म. प्र.), – 484440

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