क्वालिटी टाइम में अर्चना राय ने दैनिक अनुभवों तथा बदलते समय और समाज की बहुत बारीकी से शिनाख्त की है।

क्वालिटी टाइम में अर्चना राय ने दैनिक अनुभवों तथा बदलते समय और समाज की बहुत बारीकी से शिनाख्त की है। इस संग्रह की लघुकथाएँ समाज और उसके इर्द गिर्द जो कुछ हो रहा है, उसे बयान करती हैं और साथ ही संवेदनशीलता, मानवीयता के कई पहलुओं को उजागर करती है। इन लघुकथाओं की घटनाओं को भी दृश्यों में बुना गया है। उन दृश्यों में ‘मदर -टू पाइंट ओ’ माँ -बेटे के संवाद का दर्पण है। ‘आईना’ में हमारे समाज का समष्टिगत रूप झाँकता रहा है। ‘मेट्रो लाइफ़’ और ‘मोबाइल है न!’ की महानगरीय जीवनशैली के मकड़जाल में उलझे पति -पत्नी हैं, माँ -बेटे हैं, और ‘क्वालिटी टाइम’ में पति -पत्नी के मध्य पनपते हुए मिलाप को हाशिये पर धकेलती पारिवारिक मज़बूरी के उभार की सुगबुगाहट स्पष्ट दिखाई देती है। रमेश के गुमनाम के चिह्न भी हैं और परिवार के बुजुर्गों की संवेदना भाव को व्यक्त करने की ‘लाठी’ भी है, जो संयुक्त परिवारों के मूल्यों को बाँधे रखती है।
अर्चना राय अपनी लघुकथा का कथ्य बनाते समय दो सवाल सामने रखती हैं कि पात्रों की प्रामाणिकता सुरक्षित रहे, और दूसरे कथ्य को स्थानीयता से निकालकर व्यापक सरोकार बनाने के लिए कितनी संभाव्य कल्पना का प्रयोग किया जाना है। इन दोनों चुनौतियों को पूरा करने के लिए बदली पारिवारिक परिस्थितियों से उत्पन्न भौतिक और मानसिक जीवन मूल्य, जीवन दशाओं और धारणाओं की बात को समकालीनता से जोड़ते हुए भी कथ्य दृश्य प्रस्तुत कर देता है। अर्चना राय अपनी लघुकथाओं में ऐसा करने के लिए सिद्धहस्त लगती हैं। संग्रह में छप्पन लघुकथाएँ हैं और हर लघुकथा नए कथ्य के साथ पूरे सन्दर्भ में घटनाओं /दृश्यों के भीतरी यथार्थ का जैसे पोस्टमार्टम -सा करती है। कुछ उदाहरण देखिए –
‘अंकुरण’ माँ -बेटे के बीच घूमती लघुकथा है। माँ हैरान है कि अचानक सिंक में पड़े गन्दे बर्तन धुले हुए करीने से अपनी जगह रखे हैं, जैसे कोई राज है, जिसे माँ जानना चाहती है। यह जानना माँ की देह में ऐसी चुस्ती भर देता है कि शिथिल पड़ी माँ के तन में चेतना का संचार होने लगता है।
‘वो मरा नहीं’ में ड्राइवर को अपना बचपन याद आ गया, जब कंडक्टर की उँगली की तरफ नज़र घुमाई- “अच्छा तू पढ़ने आया है।” इतना संवाद ही लघुकथा को चेतना से लबालब कर देता है और किरदारों में उम्मीदों के रंग भर देता है।
‘ एक कदम और’ कई परतों की लघुकथा है, जब घरेलू माँ अपने उम्र के बंधनों को अपने परिवार की उपेक्षा के कारण तोड़कर अपनी इच्छा की टूट को बनाने में लग जाती है।
‘धड़क’ इस लघुकथा संग्रह की वह लघुकथा है, जो गुड्डी की मानसिकता के बीच घूमती है। गुड्डी हैरान है जब उसने सुना, “वाट हैपन्स, आर यू ओके? सिस्टर।” तो गुड्डी किसी संभावित अपराध बोध से भी बचती है और किसी अयाचित स्थिति के अंदेशे से भी। यह दृश्य इतना वास्तविक और जीवंत है कि पाठक उससे जुड़ जाता है।
‘हुनर’ लघुकथा में अपने बच्चों के हुनर को अनदेखा करके जब दूसरी शख्सियत को व्यापक और सघनता से देखा जाता है, इस तथ्य को लघुकथा अभिव्यक्त करती है। बुआ के बेटे डेविड के हुनर का ढिंढोरा पीटने और अपने बेटे की उपेक्षा को उजागर करती एक मार्मिक लघुकथा है यह।
‘नि:शब्द’ में प्रासंगिक कथ्य है, जिसमें आम पति के अहं को पकड़ने का प्रयास अर्चना राय ने किया है, और पत्नी के वजूद को अभिव्यक्त करना चाहा है। इस लघुकथा का कथ्य अछूती पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, लेकिन आवश्यक लगा है।
’संस्कार’ में मोबाइल में डूबे बच्चों की चिंताओं को पकड़ने का प्रयास किया है। वस्तुत:यह संवेदनाओं की अस्तित्वगत चेतना और सबके अन्दर से आती गहन गंभीर आवाज को समझने की लघुकथा है।
’वापसी’ में महज एक शर्ट की झलक दिखाने के लिए किरदार अवतरित होता है, यानी दिखावे के लिए फ़िक्र। जबकि जरूरत होती है आत्मीय संस्पर्श और साथ बने रहने के विश्वास की जिसे बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्ति किया है वापसी में।
‘पशुजात‘ में अर्चना राय ने ममत्व की कोमल मर्मर ध्वनियों को सुना और वसुधा के माध्यम से अभिव्यक्त किया है, जो बेजुबानों के प्रति प्रेम का बेहतरीन उदाहरण है। लघुकथा जाहिरा तौर पर वसुधा पर ही केंद्रित है।
‘सौगात‘ में अर्चना राय माँओं के प्यार को पकड़ती हैं, माँएँ आर्थिक रूप से भले ही तंग हों परंतु नातियों -दामाद के लिए उनका दिल हमेशा बड़ा रहता है। यह भारतीय समाज की पारम्परिकता और सामाजिक निजता है जिसे लघुकथा ‘सौगात’ में अभिव्यक्त किया है।
‘आमीन‘ लघुकथा में भाई -चारे का गहरा लोक रंग है, जो रहीम रघुनन्दन की दोस्ती से ज्यादा मानवीय और अनुभूति प्रवण दिखता है। रहीम और रघुनन्दन के ऐसे किरदार हैं कि हालात उन्हें जहाँ पटक दे, नियति उन्हें जिस हाल में छोड़ दे, वे दोस्ती को नहीं छोड़ते, वे जिद की तरह दोस्ती को बचाए रखते हैं।
‘दाग‘ लघुकथा में जीवन की जद्दोजहद से भरपूर रोमी अपनी जॉब को कंटीन्यू करके भरपूर उड़ान के मायने खोजना चाहती है, जिसे पति अपने अनुभव का हवाला देकर अनदेखा कर देता है। अर्चना राय ने यह लघुकथा महिलाओं की कहानी कहने के लिए लिखी है।
‘बडी‘ लघुकथा में बच्चों के अकेलेपन से जुड़ा यथार्थ धड़कता है, और बड़ी एक संभव विकल्प को कथ्य में उतारकर लघुकथा को पूर्ण करती है।
शिल्प के सन्दर्भ में लघुकथा- संग्रह में कई शिल्पगत खूबियाँ हैं, जिनमें घटनाओं की दृश्यात्मकता सबसे बड़ी खूबी है। दूसरे, ये लघुकथाएँ समकालीन यथार्थ के मनोविज्ञान की थाह लेने का दावा करती -सी सीधे पाठक के भीतर तक उतर जाती हैं, और यथार्थ को समझदारी से सामने लाती हैं। अपने अनुभव से सभी लघुकथाओं को अपने आईने से देखती हुई अर्चना राय एक खास संवेदनशीलता प्रदान करती है, जिसकी छुअन पाठक देर तक महसूस करता है। जहाँ तक भाषा का सवाल है, तो लघुकथा- संग्रह की भाषा बहुत ही सहज, सरल, बोधगम्य और संप्रेषणीय है। अर्चना राय का यह लघुकथा संग्रह प्रमाणित करता है की उन्होंने लघुकथा जगत में ठीक से उपस्थिति दर्ज कराई है।
क्वालिटी टाइम (लघुकथा-संग्रह):अर्चना राय, पृष्ठ : 120, मूल्य : 220रुपये, संस्करण:2026, ISBN :978-93-49081-34-5, प्रकाशक :श्री विनायक प्रकाशन, 3189 सेक्टर-ई, सुदामा नगर, गौपुर चौराहा, इंदौर, ( म. प्र)– 452-009