लघुकथा लेखन/संपादन के वर्तमान दौर में बहुत- सी सशक्त लघुकथाओं से गुजरा हूँ, उनमे से भी कुछ मेरी पसंद के रूप में प्रस्तुत की जा सकती हैं,पर देश के वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए मनोरमा पंत की ‘ईश्वर’ और रश्मि लहर की ‘विरोध’ का चयन ज्यादा उचित लगा। दोनों लघुकथाएँ छोटे कलेवर में अपने उद्देश्य में सफल हुई हैं।
मनोरमा पंत की ‘ईश्वर’ पढ़ते हुए नीत्शे का यह कथन स्मरण हो आया, ‘‘ईश्वर मनुष्यों द्वारा बनाई गई एक कल्पना है, इसलिए जब यह मानने का कोई अच्छा कारण नहीं रहता कि ईश्वर मौजूद है, तो ईश्वर मर जाता है।” जाति धर्म की सियायत के कारण ही आज चारों ओर मनुष्य-मनुष्य में भेद कर रहा है। अपराध हो रहे हैं और साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो रहे हैं। देश की वर्तमान परिस्थितियों पर ‘ईश्वर’ लघुकथा सार्थक सन्देश देती है। जब ईश्वर के नाम पर धार्मिक झगड़े होंगे, तो ईश्वर क्योंकर धार्मिक स्थानों में रहेगा। मनोरमा पंत की यह लघुकथा हमें सचेत करती है कि हमें मानवता की रक्षा के लिए आगे आना होगा। धार्मिक उन्मादों से किसी प्रकार की उन्नति संभव नहीं। धर्म का सहारा लेकर झगड़ने वालों का ईश्वर भला कभी न करेगा। मनोरमा पंत की यह लघुकथा वर्तमान समय में फैली धार्मिक विसंगतियों, विद्रूपताओं पर रचनात्मक प्रहार करती है। स्वयं ईश्वर की रचना में उपस्थिति से लघुकथा ज्यादा प्रभावित करती है, टिप्पणी करते हुए आदरणीय रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की ‘असभ्य नगर’ में संकलित लघुकथा ‘प्रदूषण’ स्मरण हो आई, जिसमें धार्मिक स्थलों पर जोर -जोर से बज रहे लाउडस्पीकरों से आज़िज़ आकर भगवान अपना घर छोड़ देते हैं।
रश्मि लहर की लघुकथा ‘विरोध’ भी धर्म के नाम पर होने वाली कुप्रथा का पुरजोर विरोध करती है। जब होली आती है, तो होली के नाम पर कैसी अश्लीलता, फूहड़पन और बदतमीजियाँ होती हैं, उनके तमाम वीडियो सोशल मीडिया में देखे जा सकते हैं, होली की आड़ में मानो महिलाओं के साथ बलात्कार के प्रयास हो रहे हों । रश्मि लहर की ‘विरोध’ लघुकथा में तीन महिला पात्र हैं, ‘अम्मा जी’ हैं,जो बहू को नन्दोई की छेड़छाड़ को इग्नोर करने को कहती हैं, शिप्रा(बहू) को यह स्वीकार्य नहीं है। तीसरा पात्र है ‘शिप्रा की बेटी’ जिसके प्रतिरोध से लेखिका अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है, ‘‘नहीं दादी! अबकी अगर फूफा जी ने मम्मी को जरा भी रंग लगाया तो जान लेना …सलाद की तरह उनका हाथ काट डालूँगी। सबूत भी नहीं छोड़ूँगी!”
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1- ईश्वर/मनोरमा पंत
वह भाग रहा था। भागते-भागते वह शहर से दूर वीराने में जा पहुँचा और ठोकर खाकर गिर पड़ा।
साइकिल से जाते हुए एक किशोर ने उसे उठाया और पूछा -“तुम कौन हो?’’ इतनी तेजी से भाग कर कहाँ जा रहे हो ?’’
अपने छिले हुए घुटने सहलाते हुए वह बोला- “शहर में धार्मिक दंगे हो रहे हैं। मैं ईश्वर हूँ। मैं भागकर ऐसी जगह जाना चाहता हूँ, जहाँ न मंदिर हो, न मस्जिद हो और न कोई अन्य धार्मिक स्थल हो।’’
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2-‘विरोध/ रश्मि लहर
‘‘अम्मा जी! ननदोई जी के साथ हम होली नहीं खेलेंगे, उनके रंग-ढंग ठीक नहीं हैं। वे होली के बहाने इधर-उधर छूने लगते हैं!” कहते-कहते शिप्रा का चेहरा क्रोध से भर गया!
‘‘देख बहू! तुम्हारे ननदोई बड़े आदमी हैं। अगर थोड़ा-बहुत हाथ लग भी जाए तो इग्नोर कर दिया करो। ऐसी बातें कही नहीं जाती हैं। औरतों को थोड़ा सहनशील होना चाहिए।” अपने मुँह में पान की गिलौरी रखते हुए शिप्रा की सास ने जवाब दिया।
‘‘नहीं दादी! अबकी अगर फूफा जी ने मम्मी को जरा भी रंग लगाया, तो जान लेना …सलाद की तरह उनका हाथ काट डालूँगी सबूत भी नहीं छोड़ूँगी! खबरदार ! जो किसी ने मेरी माँ की तरफ आँख भी उठाई तो।” अपने हाथ से चाकू की धार को छूते हुए शिप्रा की बेटी, जो एक शेफ थी, बीच में बोल पड़ी।
एक चुभन भरा सन्नाटा चीख पड़ा वहाँ। दादी विस्फारित नजरों से पोती के तेज धार के चाकू को देखने लगीं।
-०-सुरेश सौरभ,निर्मलनगर लखीमपुर-खीरी–262701
मो-7860600355