अक्तुबर 2026

देशकिराए का परिवार     Posted: October 1, 2026

पाँचवाँ पुरस्कार

मेट्रो शहर में अकेलापन अब सरकारी आँकड़ों में शामिल समस्या है। समाधान भी मिल गया है — “किराए का परिवार” नाम की एजेंसी। यहाँ से माँ, बाप, भाई, बहन, दादी— सब किराए पर मिल जाते हैं। लोग पार्टियों में दिखावे के लिए, सोशल मीडिया पर खुशियाँ पोस्ट करने के लिए, या अस्पताल में अटेंडेंट लिखवाने के लिए परिवार किराए पर लेते हैं।

नूपुर उन्हीं अस्थायी माँओं में से एक थी। टाइम-टू-टाइम भावनाएँ ऑन-ऑफ करनी पड़तीं, नियम यही था। एक असली माँ की तरह महसूस करना उसके काम में बाधा पैदा कर सकता था।

इस बार उसे आठ साल की आर्या के लिए भेजा गया। पिता ज़्यादा कमाते थे, पर समय कम था। माँ… तस्वीरों में कहीं दूर बस गयी थी। आर्या को स्कूल में “मदर डे” सेलिब्रेशन के लिए एक माँ चाहिए थी।

पहले दिन ही आर्या ने उसको गले लगाते हुए कहा— “आप बहुत प्यारी हो… बिल्कुल मेरी माँ जैसी।”

नूपुर मुस्कुरा दी। यह पेशेवर मुस्कान थी। पर वो छोटी बाँहें उसके दिल पर किसी अदृश्य स्याही से कुछ लिखती जा रही थीं।

कुछ दिन बीते। आर्या की दुनिया में नूपुर ही सब कुछ हो गई। कागज़ का ताज बनाती, माँ-बेटी की डांस प्रैक्टिस करती, होमवर्क में मदद… आर्या हर बार पूछती— “आप कल भी आओगी न?” और नूपुर को हर बार एजेंसी के नियम याद करने पड़ते— भावनात्मक दूरी बनाए रखें।

मदर डे आया। स्टेज पर आर्या ने माइक पकड़ा और पूरे विश्वास से कहा— “मेरी मम्मा दुनिया की बेस्ट मम्मा हैं… क्योंकि उन्होंने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।”

तालियाँ बजीं। पर नूपुर की आँखों के भीतर कुछ पिघल रहा था।

अगले दिन एजेंसी का मैसेज— “यह कॉन्ट्रैक्ट अब समाप्त हुआ। नई असाइनमेंट जॉइन करने के लिए ऑफिस आयें।”

नूपुर को जाना था। वह आर्या के घर पहुँची, कहा— “अब मैं नहीं आ पाऊँगी… काम ख़त्म हो गया है।”

आर्या पहले समझी नहीं। फिर धीमे से बोली— “काम ख़त्म… तो क्या मेरा आपका प्यार भी ख़त्म?”

नूपुर की हिम्मत जवाब देने लग गई। पर किराए की माँओं को आँसू बहाने की अनुमति नहीं होती।

आर्या ने अपना सबसे कीमती खिलौना उसके हाथ में रख दिया— “यह रख लीजिए… ताकि आप मुझे भूल न जाए।”

नूपुर लौटी तो उसके हाथ काँप रहे थे। एजेंसी के दफ़्तर में खिलौना वापस करना था—
“व्यक्तिगत उपहार रखना नियम-विरुद्ध है।”

उसने बमुश्किल खिलौना काउंटर पर रखा… और पहली बार महसूस किया— किराए का परिवार देते समय, एजेंसी यह नहीं बताती कि दिल किसका किराए पर चला जाएगा।

उस रात नूपुर ने खुद को बताया— वह सिर्फ किराए की माँ थी। पर दिल ने फुसफुसाया— नहीं… कोई बच्चा किसी को किराए पर “माँ” नहीं कहता।

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