‘‘बड़े भैया!’’
‘‘हाँ।’’
‘‘विशेषकर आपने मेरी खातिर पिताजी का फर्ज भी निभाया। जब मैं सिर्फ़ पाँच साल का था, तब पिताजी शान्त हो गए थे। छोटी–सी तनख्वाह में आपने मुझे लाड़–प्यार से पाला, पढ़ाया, शादी की।’’
‘‘….।’’
‘‘यदि मेरी नौकरी का सवाल न होता, तो मैं आपको अकेला छोड़कर बाहर नहीं जाता, यहीं रहकर हम दोनों आपकी सेवा करते। आपके त्याग, फर्ज़ और अहसानों के बदले में यदि मेरे शरीर की चमड़ी भी आपके काम आ जाए तो अपने आपको धन्य समझूँगा।’’
‘‘…।’’
‘‘बड़े भैया, एक बात कहूँ?’’
‘‘ हाँ।’’
‘‘मेरी ससुराल से जो गोदरेज की अलमारी मिली थी न, आपकी बहू जिद करती है कि उसे यहाँ से…। मैंने समझाया, पर मानती ही नहीं वह। रोज कलह करती है।’’
‘‘हूँ …ऊँ।’’
‘‘तो फिर ले जाऊँ?’’
‘‘आह!’’
‘‘क्या हुआ बड़े भैया?’’
‘‘कुछ नहीं, काँटा चुभ गया, दर्द हो रहा है।’’
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अगस्त 2026
संचयनकाँटा Posted: April 1, 2015
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