1-श्रोता
बड़ा अजीब तालाब था वो। कुछ एक छोटी मछलियों को छोड़कर उस तालाब की सभी मछलियाँ खुद के लिखे गीत गाती थीं, हालाँकि बड़ी मछलियों को चुप रहने वाली मछलियाँ पसंद नहीं आती थीं।
ऐसे ही एक दिन गीत गोष्ठी के समय एक बड़ी मछली ने चुप रहने वाली छोटी मछली को देखा तो उसके पास जाकर कहा, “कम आती हो लेकिन तुम्हें यहाँ गोष्ठी में देखकर अच्छा लगता है।”
उस छोटी मछली ने उत्तर दिया, “इस उथले तालाब में विचरण करना भी मुश्किल हो जाता है! जब भी समय मिलता है आ ही जाती हूँ, आप सभी के मीठे गीत सुनने का अवसर मिल जाता है।”
“ओह तो आज भी श्रोता बनकर ही आई हो!” बड़ी मछली ने गलफड़ फड़फड़ाते हुए कहा।
“जी हाँ, लेकिन आजकल श्रोता मिलते कहाँ हैं। गीत गोष्ठी में हर मछली को सुनाने की ही लालसा होती है।”
बड़ी मछली ने व्यंग्य से हँसते हुए साथ तैर रही दूसरी मछली से कहा, “सही कहा है इसने, हमें तो आभारी होना चाहिये। क्यों न एक अच्छा सा प्लवक इन मूक मछलियों के लिए भी इनाम के तौर पर रख दिया जाये?”
“बिल्कुल होना चाहिये, क्योंकि दूसरी मछलियां सिर्फ खुद की वाह-वाही हो इसलिए आपके गीतों को बिना सुने-समझे ही वाह-वाह कर देती हैं और इस तालाब से बाहर के इंसान और जानवर तो आपको सुनने आएँगे नहीं।” छोटी मछली ने मुस्कुराते हुए कहा।
“अरे सुनो तो…”
कहकर वह बड़ी मछली अगले ही क्षण तेज़ी से तैर कर किसी और मछली को पुकारती हुई दूर चली गईई।
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2-पार्षदवाली गली
“क्यों कमलाबाई, आज तूने उस गली में सफाई नहीं की?” सफाई दरोगा ने पूछा ।
“मैंने तो अपनी सभी गलियों में झाडू लगाईं है साब! आप कौनसी गली की बात कर रहे हो साब?” कमला ने हैरानी से पूछा ।
“कल ही तो तुम्हें वो गली दिखाई थी, वो अपने पार्षद के पासवाली गली ।” दरोगा के स्वर में झुंझलाहट आ गई ।
“पर वो तो मेरे हिस्से की गली ना है साब, वहाँ तो पीछे साल से ही सोहन जाता है ।”
“मैंने कल बताया तो था, तेरा तबादला उस तरफ के इलाके में कर दिया है ।”
“पर क्यों साब?”
“पार्षद साब तेरे काम से भोत खुश हैं, उनके कहने पर ही तेरा तबादला वहाँ किया है ।”
“अच्छा, अब समझ में आया । कल ही तो मैंने उनके चौकीदार को चप्पल मारी थी, साला हरामजादा! मुझसे बदतमीजी कर रहा था ।”
दरोगा हो-हो करके हँसने लगा ।
“साब ! सफाईवाली हूँ, आपके और सबके इशारे खूब समझती हूँ । पर याद रखना साब! मेरा नाम कमला है, किसीकी बलि न चढ़ जाए !” उसके चेहरे की गर्मी और आँखों के अंगारों ने दरोगा को सिर से पाँव तक पसीने से तर-बतर कर दिया ।
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3-बंद मुट्ठी
“क्या बात है कमली आज तू चुप है, कुछ बोल नहीं रही?” रोज़ की तरह संग-साथ काम पर जाने निकले चम्पा ने कमली से पूछा।
“…कुछ बोली क्या तू?” कमली मानो अपने खयालों की दुनिया से बाहर आते हुए कहा।
“तू ठीक तो है कमली? कुछ दिनों से देख रही हूँ, कि तू कुछ गुम-सुम सी हो गईई है।घर में सब ठीक है न, कहीं फिर से तेरे आदमी ने बेवड़ा पीकर…?” कमली का हाथ थामते हुए उसने पूछा।
“…वो…कु…छ…. न…ही…।” अटकते हुए कमली ने जवाब दिया।
कमली और चम्पा एक ही मौहल्ले में रहती थी, पड़ोसी भी थी और दोनों ही पिछले कई वर्षों से साथ में ही काम पर आना-जाना करती आ रही थी। दोनों पक्की सहेलियाँ भी थी, एक-दूजे से सुख-दुःख साझा करती आ रही थीं। इस बार ऐसा क्या हुआ था जो कमली काम पर जा तो रही थी, परंतु उसकी परेशानी और चुप्पी ने चम्पा के अंतर्मन को आशंकित कर दिया था, वह बुदबुदाई, “हो न हो! जरूर कोई बात है।
कमली ने कहना शुरू किया, “वो सीमा भाभी है न, अरे वही बड़े बंगले वाली…।” वह यह कहते हुए पुनः रुक गई।
चम्पा ने कहा, “हाँ तो, क्या हुआ उनको…?”
“वह बहुत भली हैं, यह तू भी जानती है। कल न…मैंने उनके बदन पर नील देखी, कुछ दिनों से देख रही हूँ, कि साहब और भाभी के बीच कुछ कहा-सुनी होती है और कुछ गिरने-पड़ने की आवाज़ें आती हैं।
कुछ पल रुककर वह अपनी बात जारी रखते हुए कहती है, “घर का दरवाजा उनका बेटा खोलता है, वह भी उदास रहने लगा है… थोड़ी देर बाद साहब चले जाते हैं और सीमा भाभी की सिसकियाँ सुनाई देती हैं।”
“तुझे क्या लगता है कि क्या साहब, भाभी को…? धत्त ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा सब तो अपने जैसों की बस्ती में…।” चम्पा ने कमली की बात पर अविश्वास जताते हुए कहा।”
“नहीं री, कल रोते हुए उनके बेटे के मुँह से निकल गया।”
“ओह! तो क्या ऐसा सब बड़े लोगों में भी…मैं तो सोचती थी कि यह सब सिर्फ अपने जैसे गरीब लोगों…। पर यह तो उनके घर का मामला है। तू क्यों चिंता करती है। ”
“चम्पा! हम लोग कामवाली हैं, इन घरों में काम करती हैं, यह लोग विश्वास करके हमको काम देते हैं। तो क्या हमारा फ़र्ज़…।”
“तू अपनी जगह सही है, पर हम कर भी क्या सकते हैं?”
“सीमा भाभी, अपनी ही तरह एक औरत हैं…पढ़ी लिखी हैं। जाने क्या सोचकर उन्होंने अपनी जबान पर ताला लगाया हुआ है।”
“तो…”
“तो आज मैं उनसे एक औरत बनकर बात करूँगी, और जरूरत पड़ी तो उनके घरवालों को खबर करूँगी।”
“तू बड़े लोगों के फ़टे में क्यों टाँग अड़ा …”
“औरत छोटी या बड़ी कब होती है री… बस गरीब लोगों की मुट्ठी खुली रहती है और बड़े लोगों के यहाँ बंद…।
इस बीच दोनों अपने मालिकों के घर के करीब आ गई थीं। चम्पा बोली,”देख सँभाल के …”
“हाँ चम्पा! सीमा भाभी ने हर मुसीबत में मेरा साथ दिया है, हम कामवाली हैं तो क्या…
घरेलू हिंसा के खिलाफ तो मुट्ठी…।”
चम्पा देखती रह गईई और पलक झपकते ही कमली अपनी सीमा भाभी को बाहर ले आयी थी, जिसके चहरे पर अब भी नील दिखाई दे रही थी …कमली के कदम निश्चित ही…
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4-कठपुतली
“हुँह…कठपुतली…” मीना ने व्यंग्य और पीड़ामिश्रित स्वर में कहा और मेज पर रखे अपने निजी सचिव के मोबाइल में चल रहे वीडियो को देखने लगी । स्क्रीन के मंच पर कठपुतली का तमाशा चल रहा था ।
एक छोटी बच्ची-सी कठपुतली मंच पर आई और नाचते हुए कहने लगी, “बापू ! मैं आगे पढूँगी और उसके बाद नौकरी भी करूँगी…”
नेपथ्य से पुरुष की भारी आवाज आई, “अरी छोरी! पढ़-लिखकर का करेगी ? आखिर तो तुझे चौका-चूल्हा ही देखना है । हमारे घरों की लड़कियाँ इत्ता ना पढ़तीं, तूने तो फिर भी दस पास कर लिया है…। अब अपनी माँ के कामों में हाथ बँटा ।”
थोड़ी देर में ही वह कठपुतली फिर मंच पर अवतरित हुई । अब वह एक हाथ में बेलन और दूसरे हाथ में झाडू लिए नाच रही थी ।
“मैं अभी बहुत छोटी हूँ…अभी मेरी शादी मत कराओ…” वह कठपुतली नाचते हुए गुहार लगा रही थी ।
इस बार नेपथ्य से एक पुरुष का प्रेमभरा स्वर आया, “मैं खुद पढ़ा-लिखा हूँ और मेरा अच्छा-ख़ासा व्यापार है…मैं शादी के बाद तुझे खूब पढ़ने की इजाजत दूँगा…खूब पढ़ना…”
इतना सुनते ही कठपुतली हर्ष से नाचने लगी । उसके मुख से हर्ष और आल्हाद के स्वर निकल रहे थे । नाचते-नाचते वह ऊपर उठी और नेपथ्य में चली गई ।
इस बार वह नाचते हुए मंच पर आई तो उसके पहनावे पर लिखा था—पढ़ी-लिखी घरेलु स्त्री और वह नाचते-गाते घर के कार्य कर रही थी ।
कुछ समय तक वह कठपुतली मंच पर आती रही और अलग-अलग तरीके से नाच दिखाकर नेपथ्य में जाती रही । लेकिन यह क्या ! इस बार वह कठपुतली मंच पर आई तो उसके शरीर पर विधवा का सफेद लिबास था । वह जमीन पर सिर पटक-पटककर रो रही थी । नेपथ्य से भी रुदन के स्वर आ रहे थे ।
कुछ समय तक वह विलाप करती रही लेकिन तभी नेपथ्य से एक नारी स्वर उभरा, “खुद को सँभाल पगली, अब सब कुछ तुझे ही देखना और करना है…तू एक पढ़ी-लिखी स्त्री है…तू स्वयंसिद्धा है…तुझे इस भँवर से निकलना है…”
कठपुतली के नेपथ्य में जाते ही खेल समाप्त हो गया ।
“मैम, आपने जो स्क्रिप्ट लिखकर दी थी, क्या उसके अनुसार यह फिल्म सही बनी है ?” निजी सचिव पूछ रहा था “हाँ, बिलकुल सही बनी है ।” मीना ने कहा और सोफे से उठकर अपने पति की कुर्सी पर बैठ गई । *
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5-पेट का तमाशा
“उठ कलमूँही, जल्दी उठ । तमाशे का टैम हो गया है और तू है कि अभी तलक सोई पड़ी है । सूरज सिर पर चढ़ आया है ।” माँ ने अपनी दस साल की बेटी को झिंझोड़ते हुए कहा तो बेटी ने चादर सिर पर खींच ली ।
“आज छुट्टी का दिन है नासपीटी, दो पैसे कमाने का आज ही मौका है और तू सिर पर चादर ओढ़ रही है ।” उसने चादर खींचते हुए कहा ।
“उफ्फ माँ, सोने दो ना । तनी हुई रस्सी पर रोज-रोज चलते हुए पैरों में दरद होने लगे है ।” कहते हुए बेटी ने चादर फिर से सिर पर खींच ली ।
इतना सुनते ही माँ का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा, “लाट साहब के घर में जनम लिया है ना जो सूरज चढ़े तक सोती रहेगी ! “
“तेरा बाप कोई खजाना नहीं छोड़ गया है जिसके ऊपर तेरे नखरे चलते रहेंगे । उठ जा, नहीं तो सोंटी लानी पड़ेगी ।” कहते हुए उसने एक झटके से चादर खींच ली ।
“ओह माँ, अभी तो ठीक से दिन भी ना निकला !” वह अलसाई-सी उठी और आँखों को मसलती हुई माँ से लिपट गई ।
“बेटी, जब तमाशे से दो पैसे मिलेंगे तभी तो अपना दिन निकलेगा !” माँ बाहर झाँक रही थी ।
“अच्छा , चल अब कुछ खाने को दे, बहुत भूख लगी है ।” बेटी जमीन पर ही बैठ गई ।
“अभी कल रात ही तो तूने भरपेट रोटी खाई थी !”
“वह तो कल रात थी माँ, अब तो सुबह हो गई है । अब क्या खाने को कुछ ना देगी ?”
“कनस्तर खाली है बेटी और उसमें आटा तभी आयेगा जब तू भरे बाजार में तमाशा करेगी । हमारा पेट और कनस्तर तो इसी तमाशे से जुड़े हैं बेटी । तू उठेगी, मैं ढोल बजाऊँगी और तू रस्सी पर चलेगी तभी तो कनस्तर में आटा आयेगा ।” माँ दीवार पर टंगे ढोल को देख रही थी और बेटी अपने खाली पेट को ।
“चल बेटी, आज मैं बहुत जोर से ढोल बजाऊँगी, तू बहुत ऊँची रस्सी पर खेल दिखाना, मैं आज तुझे चुन्नू हलवाई की दूकान से भरपेट जलेबी खिलाऊँगी ।”
माँ ढोलक हाथ में लिए झोंपड़ी से बाहर निकल रही थी और बेटी भरपेट जलेबी के सपने से बंधी पीछे-पीछे खिंची आ रही थी ।
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6-रीढ़ की हड्डी
धर्मेश बाबू के दो बेटे और एक बेटी थी । बेटों की हर फरमाइश पूरी करने का प्रयास करते । बेटी कसमसाती रह जाती । बचपन में तो ज़िद्द करती थी पर धीरे धीरे उसने सम्झौता करना सीख़ लिया था । उसने अपनी पढ़ाई पुरी कर अपना घर बसा लिया । दोनों बेटों को पढ़ने के लिए विदेश भेजा गया , वहां उन्होंने भी अपनी अपनी पसंद से अपना संसार बसा लिया । धर्मेश बाबू ने अपने बेटों के लिये जो क़र्ज़ लिया था उसको चुकाते – चुकाते वे रिटायर हो गये फिर भी कर्ज अजगर बन उनको निगल रहा था । घर के नीलामी की नौबत आ गईई । बेटों ने अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लिया कि , ” बापू , विदेश में अपने लिये ही खर्च निकाल पाना मुश्किल होता है आपको कहाँ से भेजें । आप वहाँ अकेले ही तो हो घर बेच दो । ”
बेटों के मुँह से जब यह सुना तो लगा कि जैसे किसी ने उनकी रीढ़ की हड्डी पर जम कर वार किया है ।
नीलामी हो रही थी , धर्मेश बाबू के आँसू नहीं रुक रहे थे । बाहर से जोर से हथौड़े की आवाज़ आई , बोली लग चुकी थी । घर आख़िर बिक ही गया था । निराश मन से वे एक कोने में अकेले खड़े थे । अचानक उनकी पीठ पर किसी के हाथ का स्पर्श हुआ । मुड़कर देखा तो एक नौजवान था । धर्मेश बाबू ने उसको ऐसे देखा मानो पहचानने की कोशिश कर रहे हों । उस नौजवान ने कहा , ” बाबूजी , मैं आपका दामाद हूँ । आप कहीं नही जा रहे । यह घर आज भी आपका ही है । वो देखिये वहाँ , वो रही शीला आपकी बेटी जो अब एक कंपनी की मालकिन बन चुकी है । ”
धर्मेश बाबू ने उसकी ओर देखा और बोले ,” तो क्या बिट्टू ने यह घर ख़रीदा !”
सामने से शीला कुछ कागज़ातों के साथ उनकी तरफ आती दिखाई दी । करीब आकर शीला ने वो सारे कागज़ अपने पिता के हाथ में थमा दिये । धर्मेश बाबू की बूढ़ी हड्डियां फिर से जी उठी।
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