सितम्बर 2026

पुस्तककथा समय: दस्तावेजी लघुकथाएँ     Posted: April 1, 2020

काव्य में अज्ञेय जी ने नया प्रयोग करते हुए ‘तार सप्तक’ निकाला जिसमें सात वरिष्ठ कवियों की श्रेष्ठ कविताएँ लेकर संकलन तैयार किया। जब भी श्रेष्ठ काव्य की बात चलती है तो अज्ञेय जी का वह काम अनायास याद आ जाता है उसी प्रकार यहाँ भाटिया जी लघुकथा विधा में नया प्रयोग कर रहे हैं । लघुकथा विधा के आठ सशक्त हस्ताक्षर जिनमें छह वे हैं, जो  चार-पाँच दशकों से विधा विशेष में कार्य कर रहे हैं  ( भगीरथ, बलराम अग्रवाल, अशोक भाटिया, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा ) वहीं दो लघुकथाकार  ( चन्द्रेश कुमार छतलानी, और दीपक मशाल ) युवावर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनकी 25 -25 श्रेष्ठ लघुकथाओं के साथ, उनके लघुकथा विधा संबंधी विचारों को लेकर यह संकलन तैयार किया है। इसे पढ़कर पाठक  विधा की गहराई  से अवगत होंगे जब भी श्रेष्ठ लघुकथाओं की बात चलेगी तो भाटिया जी का यह काम अवश्य याद आएगा।

साहित्य का काम है सोई हुई चेतना जागना, शोषण के विरुद्ध हथियार थमाना, इंसान को विवेकशील बनाना , परपीड़ा को समझना, मानवीय मूल्यों के आविर्भाव में सहयोग करना, धर्म के मर्म को जानना, नारी सशक्तीकरण की बात करना आदि विषय इन लघुकथाओं के केन्द्र में हैं। ये लघुकथाएँ काल के साथ कदमताल करती समाज के भीतर उतरकर उसके यथार्थ चित्रण करने में सफल हुई हैं। कमाल की बात तो यह है कि जब एक ही विषय पर इन लघुकथाकारों की लघुकथाएँ पढ़ते हैं तो निर्णय कर पाना मुश्किल-सा जान है कि कौन किससे श्रेष्ठ।  जैसे शिक्षा व्यवस्था पर लघुकथाएँ (शिक्षा , गरीब का गाल, लगा हुआ स्कूल, बैल, गाय नहीं काउ , फेलोशिप ) भ्रष्टाचार पर (रेंजर दौरे पर है, तीसरा चित्र, देश, प्रतिमाएँ, मानव मूल्य, खरीदी हुई तलाश, शिकार ) नारी-शक्ति (फूली ,स्त्री कुछ नहीं करती, ईश्वर) साम्प्रदायिकता पर (धर्मपिरपेक्ष, गोभोजन कथा, बताया गया रास्ता, चादर, मेढकों के बीच,  ,धर्म प्रदूषण) किसानी जीवन, (मंडी में रामदीन, खुदकुशी, धरती के बेटे, कर्मयोगी, अन्नदाता, ) आदि

मैं समझता हूँ इन लेखकों के पास वो दृष्टि एवं अनुभव हैं, जो मानव की आत्मा की आवाज सुन लेते हैं। वैसे भी साहित्य बाहर की नहीं, अंदर की यात्रा है। जो लेखक दूसरे के मनोभाव समझ ले, वही साहित्यकार प्रभावशाली सृजन कर सकता है। सभी लेखकों की एक-एक रचना बानगी के तौर पर-

जब भगीरथ की ‘फूली’ लघुकथा पढ़ते हैं तो स्त्री का विद्रोही रूप सामने आता है। वो अंदर की आग है, जो कभी न कभी  बाहर निकलनी ही है, क्योंकि अति हर चीज की बुरी होती है। औरत दिन-रात काम करे पुरुष निठल्ला पड़े रहे, वह कब तक सहे। अंत में वहीं होता है जो लघुकथा ‘फूली’ में दर्शाया गया है।

फूली बोली,‘‘दीखता नहीं है! सुबह पैली काम तेरा बीरजी करेगा, बता। आज तो वीर को भगा के ही मानूँगी। मेरा घर बरबाद हो रहा है और मैं देखती रहूँ! भगत भाव को कोई टैम व्है है।’’ कहते हुए आग को उसकी ओर बढ़ाया। अगर भानिया पीछे नहीं हटता, तो आग उसके  मुँह में घुस जाती।

भानिया एकदम पलटा ,दालान में आया और चरी उठाकर दूध दुहने लगा।  पृष्ठ-45

 बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘अलाव के इर्द-गिर्द’ शोषण के विरूद्ध लड़ने को हथियार थमाती है, साथ में प्रेरणा भी देती कि अकेले नहीं, एकजुट होकर उसके खिलाफ लड़ो। अपनी जमीन बचाने के लिए अलाव के इर्द-गिर्द बैठे किसान प्रतीकात्मक रूप से एकजुट होने की  कैसी मिसाल पेश कर रहे हैं वह देखते ही बनता है-

कुहासे भरे उस सर्द रात के तीसरे पहर लपटों के तीव्र प्रकाश में बदरू ने श्यामवर्ण मिसरी के ताम्बई पड़ गए चेहरे को देखा और अलाव के इर्द-गिर्द बिखरी पड़ी डांडियों-तीलियों को बीनकर उसमें झोंकने लगा। पृष्ठ-66

 अशोक भाटिया की लघुकथा‘ समय की जंजीरें’ जहाँ इतिहास पर कब्जा जमाए बैठे लोगों की मनोवृत्ति को उजागर करती है, वहीं शिक्षा के बढ़ते प्रभाव से दबी कुचली आवाजें अपने हक के लिए उठ खड़ी होती हैं। इस  लघुकथा में उम्मीद की नई खिड़की खुलती नजर आती है। यही तो सच्चा साहित्यिक कर्म है।

मानो दबी हुई गेंद पर से किसी ने पैर का दबाव हटा दिया हो, वह  साँवले रंग वाली छात्रा अपनी बात कहने लगी। कहने लगी, तो कहती गई,कहती ही गई……

इतिहास ने अपनी भारी-भरकम देह के जख़्मों पर थोड़ा मरहम महसूस किया।

समय की जंग-भरी जंजीरों में कसमसाहट हुई….। पृष्ठ-99

ईश्वर का रूप क्या है, ईश्वर कहाँ बसता है, ईश्वर की आवश्यकता क्यों है…. ईश्वर क्या करता है ऐसे ही सवालों का जवाब है  सुकेश साहनी की लघुकथा ‘ईश्वर’ में। इसमें वे ईश्वर के नाम पर होने वाले आडम्बरों से बचने की नसीहत देते हुए कर्म के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं-

श्मशान से मेरी अस्थियां चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों से आंसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसे, वह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजा-पाठ (ईश्वर ) के लिए अब उसे समय ही नहीं मिलता।….ईश्वर? …वह उसकी आंखों में झाँक रहा है। पृष्ठ-123

कमल चोपड़ा अपनी लघुकथा ‘धर्मनिरपेक्ष’ के माध्यम से धर्म के वास्तविक मर्म को समझाना चाहते हैं। धर्म इंसानों को जोड़ने की सीख देता है न की तोड़ते की। कहने को देश धर्मनिरपेक्ष है पर इसी देश में साम्प्रदायिकता की आग कैसे फैलाई जा रही है, किसी से छिपा नहीं है।

कुत्तों ने भर्राए स्वर में कहा-‘‘महाराज, मेरी जान बख्शी जाए; पर मैं जानना चाहूँगा कि किसी भी धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में दंगे कैसे होते हैं। सभी एक जैसे रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा से बने हैं फिर भी आपस में लड़ते हैं।  ज्ञात हो हर प्राणी को अपने बुद्धि विवेक से काम लेना चाहिए, अगुओं के पीछे आँख मूँदकर नहीं लगना चाहिए। अगर जंगल में साम्प्रदायिकता की आग फैली तो समझ लीजिएगा कि राजनीति ने धर्म को अपनी रखैल बना लिया है।’’ पृष्ठ 154

   देश में सबसे गंभीर समस्या है जातिवाद। माधव नागदा अपनी लघुकथा ‘कुणसी जात बताऊं’ में ऐसे ही जातिवाद की संकीर्ण सोच से ग्रस्त  व्यक्ति का चित्र खींचते हैं-

‘‘….पानी की नहीं, तेरी जात पूछूँ हूँ?’’ प्यासे व्यक्ति ने पनिहारिन से पूछा।

‘‘कुणसी जात बताऊँ बा। ये निपूती तो दिन-भर में छतीस ई जात जी लेती है।’’पनिहारिन ने दीर्घ साँस ली और सुबह से लेकर रात्रि तक के काम गिनवाने लगी…..।

‘‘बस,बस बेटा। अब और नहीं। तू तो ठंडा पानी पिला दे।’’

पानी पीते हुए वृद्ध को अपनी बेटी याद आ जाती है। पृष्ठ-185

जब हम चन्द्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा ‘मृत्यु दंड’ पढ़ते हैं, तो महाभारत काल के कीटाणुओं से जूझते हुए आधुनिक काल में आ उतरते हैं। और जेहन में बनी भीष्म, द्रोणाचार्य  की भव्य मूर्ति खंड-खंड होकर बिखर जाती है। यदि उस काल में नारी के सम्मान को सरेआम धराशायी करते अपने बच्चों को डांट देते..या उसके विरुद्ध आवाज उठाते तो शायद आज की संताने ऐसे कदमों पर न चलती-

             कृष्ण ने दोनों की तरफ अपनी पीठ कर ली फिर भर्राये स्वर में कहा-‘‘जो धर्म की हानि आपने की थी,अब वह इस धरती पर बहुत व्यक्ति कर रहे हैं,लेकिन किसी चरित्रहीन द्रोपदी को…वस्त्र देने मैं नहीं जा सकता।’’

कृष्ण फिर मुडे़ और कहा,‘‘गुरुवर पितामह ,क्या यह दंड पर्याप्त नहीं कि आप दोनों आज भी बहुत सारे व्यक्तियों में जीवित हैं ,लेकिन उनमें कृष्ण मर गया। पृष्ठ-221 

दीपक मशाल की लघुकथा ‘पानी’ जहाँ उत्तराखंड में आए महाप्रलय से अपनी जान बचाकर आये व्यक्ति की मनोदशा का  मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं, वहीं उस स्थिति में भी अवसरवादी हर अवसर को भुनाने से बाज नहीं आते, उन पर करारा व्यंग्य करते हैं।

‘‘दद्दू , नया कूर्ता और धोती पहनकर बैठिएगा, अखबारवाले एक घंटे में आ जाएँगे।’’

‘‘लेकिन मुझे तो न कुछ बोलना आता और ना ही मैं किसी से बात करने की अवस्था में हूँ, खामख्वाह तुमने….’’

गाँव वाले मान रहे हैं कि आप पर शिव की विशेष कृपा है, तभी न बच के आ पाए। इसलिए इस साल प्रधानी के लिए खड़े कर रहे हैं।

उसे दिखाई दिया छोटा आपदा के समय पानी बेचने वाले के  साँचे में ढलता जा रहा वह अपनी हथेलियों से दोनों कानों को ढकते हुए चीख पड़े- चल भाग जा राक्षस…मैं मर जाऊँगा लेकिन बीस गुणी कीमत पर का तेरा पानी नहीं पीऊँगा।पृष्ठ- 238

ये लघुकथाएँ मानवीय सोच के विविध आयाम सामने रखकर पाठक को चिंता एवं चिंतन के लिए बाध्य करती हैं।  हर लघुकथा अपने कथ्य एवं शिल्प का कमाल दिखाते हुए असरदार साबित होती हैं। वैसे तो इस विधा में ये सब बड़े नाम हैं पर इनसे बड़ी हैं इनकी रचनाएँ। आवरण पृष्ठ बहुत आकर्षक है।  

कथा समय :(लघुकथा संकलन )सम्पादक-डॉ. अशोक भाटिया,अनुज्ञा प्रकाशन,पृष्ठ- 256,मू. 300   

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