“इतनी जल्दी क्या है सखी, ज़रा ठहर कर आना…कितने ही काम पड़े हैं अभी निपटाने को”-
वह बुदबुदाती हुई बालकनी से आसमान की ओर देख रही थी।
रसोई में चूल्हा अब भी गर्म था। सिंक में बर्तन, कमरे में बिखरे कपड़े, मेज़ पर बच्चों की कॉपियाँ, कल सुबह के टिफिन की तैयारी, रात का भोजन—कामों की कतार अब भी बाकी थी। शाम आने से पहले उसे सब समेट लेना था।
शाम जैसे हर रोज़ की तरह दबे पाँव आकर खड़ी हो गई—हल्की ठंडी हवा, फीकी पड़ती धूप और थोड़ी-सी राहत लेकर।
वह मुस्कुराई—“चलो अब आ ही गई हो तो थोड़ा रुक कर जाना…अदरक वाली चाय पीकर जाना।”
हाथों ने काम की रफ्तार धीमी कर दी। दिन भर की थकी साँसें जैसे अपने होने का अहसास दे रही थीं। वह उठी, चाय चढ़ाई। कप में चाय डाली और खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई। इतने में दरवाज़े की घंटी बजी। बच्चे लौट आए, टीवी बोल उठा, रसोई ने फिर आवाज़ दी।
साँझ खड़ी रही—कुछ देर—फिर बिना कुछ कहे खिसक गई।
वह एक पल को ठिठकी—हाथ में चाय का कप था, भाप अब भी उठ रही थी। उसने बालकनी की ओर देखा— शाम जा चुकी थी। अँधेरा उतर चुका था। वह हल्के से मुस्कुराई— साँझ रोज़ आती है। बस, उसके पास रुकने का समय नहीं आता।
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