नवम्बर 2026

दस्तावेज़एक ही छत पर अलग-अलग     Posted: November 1, 2026

यात्रा, केवल सड़क नापना भर नहीं है; पहाड़, नदियाँ, वन-उपवन, पगडण्डी पार करना मात्र नहीं है। जिस मार्ग से हम जा रहे हैं, उस वन, पर्वत, नदी आदि के परिवेश का आनन्द प्राप्त करना भी है। सर्जन भी ठीक वैसा ही है। केवल कथावस्तु का शाब्दिक ज्ञान या अनुभव पर्याप्त नहीं। शब्द के साक्षात् अर्थ से होती हुई हमारी यात्रा शब्द के एकाधिक अर्थों तक पहुँचने की होती है। लघुकथा में भी केवल शाब्दिक अर्थ की प्रतीति ही सब कुछ नहीं। शीर्षक के नाम पर कथा से उठाकर कुछ शब्द टाँक देना पर्याप्त नहीं है। उस शीर्षक का कथा की आत्मा से जुड़ाव होना भी आवश्यक है।

अच्छी रचना में हमारी यात्रा के कई पक्ष होते हैं। वाच्यार्थ से आगे की यात्रा, सर्जन को प्रभावशाली बनाती है। शब्दार्थ और वाच्यार्थ यानी शब्दकोशीय अर्थ तो किसी प्रसंग विशेष में एक ही होता है, लेकिन उस शब्द के व्यंग्यार्थ एक से अधिक हो सकते हैं। व्यंग्यार्थ को समझने के लिए रचना का समग्र प्रभाव और उसकी प्रतीति आवश्यक है। यह तुरन्त ही हो जाए, नहीं कहा जा सकता। गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करने के बाद उसे हृदयंगम करना अनिवार्य है। रसज्ञ के अनुसार एक ही रचना के कई पाठ हो सकते हैं। वे सभी पाठ ग्राह्यशक्ति और व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हो सकते हैं। कोई पात्र किस सन्दर्भ में, किस भाव-मुद्रा में, किस तरह और किस लहज़े में क्या कहता है, यह पूरे शाब्दिक परिदृश्य को बदल देता है। उस समय का कथन केवल शाब्दिक कथन न होकर, हाव (आंगिक क्रिया-कलाप) और भाव से अनुप्राणित होता है।

सपाटबयानी वाली लघुकथाएँ वाच्यार्थ से आगे नहीं बढ़ पाती हैं। यदि लघुकथा का किसी मंच पर वाचन किया जा रहा है, तो वह पढ़ना भर नहीं होता। कथ्य के अनुरूप हाव-भाव, विराम आदि का ध्यान रखकर वाचन करने से ही रचना सम्प्रेषित हो पाती है। लेखकीय ईमानदारी से ही लघुकथा को आगे बढ़ाया जा सकता

डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल जी लगभग छह दशक से हिन्दी-साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। काव्य (गीत, ग़ज़ल, दोहा), गद्य-विधाओं (व्यंग्य, नाटक, कहानी, संस्मरण आदि) के राष्ट्रीय स्तर के सृजक हैं। हर विधा में रचनाकर्म का निर्वाह करना सरल नहीं है। आपने लघुकथा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति अंकित की है, अर्थात् लगभग 82 वर्ष की अवस्था में। आप किसी आन्दोलन से नहीं जुड़े हैं। समय-समय पर जो कथाएँ लिखीं, उन्हीं में कुछ लघुकथा-संग्रह के रूप में जा रही हैं। इनकी दृष्टि विषयवस्तु की नवीनता पर रही है; लेकिन साथ ही सामाजिक सरोकार को भी ध्यान में रखा है। आज का नया, सजग और स्थापित लेखक महानगर के शोर और संचार माध्यमों की उठा-पटक में बहुत सँभलकर चल रहा है। अभिव्यक्ति के जितने पटल उग आए हैं, उनके कारण मनुष्य सर्वाधिक अकेला हो गया, भीड़ में भी नितान्त अकेला। अग्रवाल जी ने उसी विद्रूपता को गहराई से समझा और रेखांकित किया है। कुछ लघुकथाओं का अवलोकन किया जा सकता है।

‘अजनबी’ लघुकथा में-में एक साथ होने पर भी अकेलेपन की यह विडम्बना कितनी भयावह है! घर के चार सदस्य एक साथ डाइनिंग टेबल पर उपस्थित; लेकिन एक दूसरे से एकदम निस्संग, निर्लिप्त और एकाकी। वे कोई अजनबी न होकर एक ही परिवार के सदस्य हैं, जो दिखते एक हैं; लेकिन अनुभूति और व्यवहार के स्तर पर नितान्त अकेले हैं। इन पंक्तियों में अजनबीबन की वही फाँस रह-रहकर कसकती है। सबके साथ होने पर भी अकेलापन-डाइनिंग टेबल पर खाना सज चुका था। घर के चारों सदस्य मौजूद थे; लेकिन वहाँ ‘बातचीत’ की जगह सिर्फ़ बर्तनों के टकराने की आवाजें और मोबाइल के ‘नोटिफिकेशन’ का शोर था। ई-मेल्स का जवाब देना, मल्टीटास्किंग, इंस्टाग्राम भोजन से भी अधिक अनिवार्य हो गए हैं। व्यक्तित्व का पारिवारिक रूप से इतना बड़ा विखण्डन कभी नहीं हुआ। यह अजनबीपन अलग-अलग स्तरों पर बढ़ता जा रहा है। ‘हेडफ़ोन’ इस घरेलू शोर से मुक्ति का बड़ा उपाय है। आपसी बातें यानी निरर्थक बातें, घर में हाई-स्पीड वाई-फाई होते हुए भी भावनाओं का ‘सिग्नल’ एकदम नदारद है। यह लघुकथा केवल कोई कथा नहीं है; बल्कि मृतप्राय: संवेदनाओं के लिए आपात्कालीन अलार्म है।

एक समय वह था, जब माता-पिता खोजते थे कि बच्चे खेलने के लिए किस गली-मुहल्ले में निकल गए। अब समय है कि बच्चे घर में हैं; लेकिन माता-पिता के पास समय नहीं है। यह कालखण्ड बड़ा क्रूर है। इसका परिणाम यही सामने आएगा कि जब माता-पिता को सहारे की आवश्यकता होगी, ये बच्चे, बड़े होकर भावनात्मक रूप से भी दूर जा चुके होंगे। एक ऐसी ही और लघुकथा ‘सन्नाटा’’ , बड़े घर का बड़ा सन्नाटा। बच्चों के पास खिलौने, अलग कमरा, लेटेस्ट गेमिंग आदि सब कुछ होते हुए भी डराने वाली दीवारों की ख़ामोशी है। ‘मेरा सुखी परिवार’ चित्र पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले आरव की प्रसन्नता पर तुषारापात होता है। कारण, वह अपनी उपलब्धि की प्रसन्नता किससे बाँटे? अग्रवाल जी व्यंग्य के भी सशक्त हस्ताक्षर हैं। आरव की मम्मी ‘पेरेंटिंग ब्लॉग’ में और पापा इंटरनेशनल क्लाइंट के साथ ज़ूम कॉल में व्यस्त थे। सब कुछ होते हुए भी पारिवार के हर व्यक्ति के हिस्से में केवल सन्नाटा आता है। बच्चे इस सन्नाटे से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। अग्रवाल जी की पकड़ समाज की उस नब्ज़ पर है, जिसकी ओर से हम कबूतर की तरह आँख बन्द किए हुए हैं।

‘दूरी’ लघुकथा में सुख-सुविधा के सारे साधनों से सम्पन्न सोसायटी है। सब कुछ के बीच अपनों की ‘आवाज़’ नहीं है। वर्मा जी को नितान्त अकेलापन व्यथित करता है। घर में सब हैं, अपने-अपने कामों में खोए हुए या पूरी तरह गर्क कहें, तो समीचीन होगा। बात करने के लिए ‘एलेक्सा’ तो थी; लेकिन एक यन्त्र का मानवीय संवेदनाओं से क्या सम्बन्ध। वे मन बात किससे कहें कि ‘आज मेरा मन उदास है।’ इसी दूरी ने सबको अपने-अपने वीरान टापू पर रहने के लिए विवश कर दिया है।

आज के विषम जीवन को इन तीनों लघुकथाओं में खूबसूरती से उतार दिया है। एक बात फिर से कहूँगा-ये लघुकथाएँ करुणा जगाती हैं और साथ ही आज के भागदौड़ के जीवन से आतंकित भी करती हैं। बड़ों का सम्मान विदा हो चुका है। भावात्मक सम्बन्ध ऊन के धागों की तरह उलझ गए हैं, जिन्हें जितना भी सुलझाओ, वे उतना ही उलझते जाते हैं। ‘अपलोड’ और ‘अपडेट’ का रिश्ता-लघुकथा भी दाम्पत्य जीवन की ऐसी ही विडम्बना से साक्षात्कार कराती है। शालिनी और मयंक की शादी की ‘सालगिरह’ का सुख भी फ़ोन, फोटो लेकर कैप्शन लिखने, कमेंट और लाइक्स की भेंट चढ़ जाता है। शालिनी, मयंक के ‘तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो और मैं तुम्हारे साथ खुश हूँ।’ इतने से कमेण्ट के लिए तरसती रह जाती है। इससे बड़ी जीवन की विसंगति क्या होगी कि हम साथ होकर भी साथ नहीं हैं। भावनात्मक रूप से रूखे ही नहीं सूखे भी होते जा रहे हैं।

परिवार से हटकर जब कम्पनियों की बड़ी नौकरी की बात करते हैं, तो एक तथ्य सामने आता है-जब तक किसी व्यक्ति के बिना काम नहीं चलता, उसे साथ रखा जाता है। जब उसकी उपयोगिता या आवश्यकता नहीं रहती है, तो उसे दूध की मक्खी की तरह निकालकर बाहर कर दिया जाता है। हानि-लाभ के ये निर्मम सम्बन्ध हैं। ‘लॉग-आउट’ के बाद का सच, लघुकथा में कम्पनी वालों की क्रूर मानसिकता का सजीव चित्रण किया गया है। अस्पताल पहुँचते ही नितिन का ‘ऑफिस फैमिली’ का कन्सेप्ट हवा हो गया। ऑफ़िस के लिए कर्मचारी संसाधन के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

घिसे-पिटे विषय पर न लिखकर जिन ज्वलन्त विषयों पर गिरिराजशरण अग्रवाल जी ने अपनी लेखनी चलाई है, वह अनुकरणीय है।

घर-परिवार से इतर सामाजिक जीवन में धूर्त्तता का उत्तरोत्तर परिवर्धन हुआ है। राजनीति आज के समय में शीर्ष पर है। सामाजिक हित के लिए समर्पित लोगों की संख्या घटती जा रही है। अधिकतम का उद्देश्य लूट-खसोट करके सम्पत्ति-अर्जन ही रह गया है। मुहल्ले की सड़क पर जिस गड्ढे का उल्लेख किया है, वह एक सामाजिक प्रतीक है। नेता जितना बड़ा होगा, गड्ढे भरने का उसका फलक उतना ही विस्तृत होगा। सामान्य जनता केवल मतदाता बनकर रह जाती है।

लेखक ने जहाँ अंग्रेज़ी के शीर्षक दिए हैं, वे लघुकथा की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं। आशा करता हूँ कि एक ही छत के नीचे की ये कथाएँ पाठकों को पसन्द आएँगी।

एक ही छत पर अलग-अलग(लघुकथा-संग्रह):गिरिराजशरण अग्रवाल, मूल्य: ₹300/ रुपये, पृष्ठ:144, संस्करण : प्रथम 2026, प्रकाशकः हिन्दी साहित्य निकेतन,  16 साहित्य विहार बिजनौर-246701, ईमेल : hindisahityaniketan@gmail.com

’

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine