वर्तमान समय में लघुकथा से सन्दर्भित विभिन्न दृष्टिकोण, लघुकथा की भाव भूमियों, लघुकथा के विषयों, विचारेां और प्रयोगों को लेकर लघुकथाकारों और लघुकथा के समीक्षकों के मध्य वैचारिक गहमा-गहमी व्यापक रूप से देखी जा रही है। लघुकथा में उचित सम्प्रेषण हेतु नए-नए शिल्प रूपों की खोज भी निरन्तर की जा रही हैं। लघुकथा में कथ्य, उसमें निहित वस्तु, घटना, चरित्र एवं परिवेश आदि के सम्बन्ध में समय-समय पर चर्चा-परिचर्चाएँ होती रही हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल यह अटका हुआ मिलता है कि लघुकथा की सृजन-प्रक्रिया में कथ्य, वस्तु, घटना, चरित्र और वातावरण में से किसी एक कारक का चयन न कर समस्त कारकों का अभिलेखन कोई लघुकथाकार सम्पूर्ण संवेगों और सम्पूर्ण चेतना के आधार से कैसे नियोजित कर सकता है? इसके अलहदा लघुकथा की रचना-प्रक्रिया से जुड़े होकर और भी अनेक सवाल हैं जिसको लेकर समाधानों की खोज निरन्तर जारी है।
पेशे से चिकित्सक और स्वतन्त्र लेखन कर्म से जुड़े कमल चोपड़ा ने लघुकथा की रचना-प्रक्रिया और लघुकथा से सन्दर्भित कई मसलों के जवाब में हाल ही में लिखी पुस्तक ‘लघुकथा: सृजनात्मक सरोकार’ लघुकथा के पाठकों/आलोचकों के मध्य उतारी है। प्रस्त्ुत पुस्तक में लघुकथा-लेखन विषयक बहुतेरे बिन्दुओं पर खुले तौर पर की गई चर्चाएँ देखने को मिलती हैं। जिसके पीछे न केवल एक समर्थ लघुकथाकार कमल चोपड़ा की अपितु लघुकथा-विधा को पुष्ट करने में सन् 2008 से अनवरत निकाल रहे लघुकथा पर केन्द्रित वार्षिक मगर मूल्यवान पत्रिका ‘संरचना’ के संशक्त सम्पादक कमल चोपड़ा की, उन तमाम विशिष्ट अनुभूतियों का भण्डारण हैं, जो लघुकथा की दशा, दिशा और सम्भावनाओं पर उनकी अन्वेषण दृष्टि का प्रतिफल है।
लघुकथा की रचना प्रक्रिया को लेकर कमल चोपड़ा ने समय-समय पर अनेक सारगर्भित लेख लिखे हैं। जो लघुकथा विषयक उनके द्वारा सम्पादित संरचना से लेकर मौजूदा समय की लघुकथा सन्दर्भित अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। लघुकथा पर ऐसे ही उपयोगी आलेखों का महत संकलन ‘लघुकथा: सृजनात्मक सरोकार’’ शीर्षक से जिल्दबंद होकर सामने आया है, जिसमें कमल चोपड़ा की लघुकथा विषयक वेबाकी के साथ बाते है। पुस्तक में प्रकाशित प्रथम आलेख ‘लघुकथा: संश्लिष्ट सृजन-प्रक्रिया’ में लघुकथा के संबंध में महत्वपूर्ण बाते रखते हुए कमल चोपड़ा कहते हैं, ‘‘रूपबंध की दृष्टि से लघुकथा एक इकाई है और उसे उसके संश्लिष्ट रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिए। पाठक उसे एक इकाई के रूप में लेता है। कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा, उद्देश्य आदि के सामंजस्य से लघुकथा बनती है।’’
वास्तव में लघुकथा का की सही जमीन उसका कथापन है। कथ्य ही लघुकथा का मूल तत्व है। मानवीय सम्वेदना लघुकथा के सन्दर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है। इसी तारतम्य में कमल चोपड़ा समकालीन लघुकथा की सृजनावस्था पर प्रकाश डालते हुए कहते है कि, ‘‘समकालीन लघुकथा में ज्यादातर दो परस्पर विरोधी घटनाओं या स्थितियों को लघुकथाकार उठाता है और उनमें अन्तर को दिखाने का प्रयास करता है। कथनी करनी के अन्तर को घटनात्मक स्थिति न भी मानें तो भी अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं। कमल चोपड़ा का मानना है कि लघुकथा में साधारण मनुष्य से लेकर विशिष्ट वर्ग के पात्र लिए जा सकते है। स्थिर, गतिशील, जटिल, सरल, संघर्षरत, स्वाभाविक, सजीव, स्वतन्त्र किसी भी कोटि के पात्र लघुकथा में रखे जा सकते हैं।
लघुकथा के प्रायः सभी अवयवों पर चर्चा करने के दरम्यान कमल चोपड़ा लघुकथा में ‘कालदोष’ पर भी अपना अभिमत देते हुए कहते है, ‘‘अगर लघुकथा में महीनों या वर्षों का कालानुक्रमिक बारीक अतिरंजन चित्रण सविस्तार किया जाए तो लघुकथा अपनी आकारगत विशिष्टता को खो देगी। उस रूप में महीनों या वर्षों का चित्रण अवश्य ही ‘कालदोष’ के रूप में आएगा।
हिन्दी लघुकथा विधा का परिदृश्य दिन-ब-दिन समृद्ध हो रहा है। वर्तमान में नई और पुरानी पीढ़ी रचनात्मक रूप से सक्रिय होकर हिन्दी लघुकथा को अपने अनुभव, यथार्थ को देखने की अपनी दृष्टि, अपने नवीन विस्तार, अपनी प्रतिभा, कौशल, सोच आदि से लघुकथा की रचनात्मकता को सुदृढ़ बना रही है। एक बड़ी बात लघुकथा के युवा रचनाकारों के सन्दर्भ में कमल चोपड़ा कहते है कि, ‘‘लघुकथा को युवा रचनाकारों का साहित्यिक आन्दोलन कहा जा सकता है।’’ लेकिन बरअक्स इसके युवा रचनाकारों के मार्ग को प्रशस्त करने की अपेक्षा युवा रचाकारों के आगमन या संलग्नता को ही अवरोधक मानने वालों की कमी नहीं है? यह विचार लघुकथा के विकास की स्थिति पर ‘रूकावट’ का एक बड़ा व्यवधान है। लघुकथा में युवा वर्ग की उपस्थिति का स्वागत होना चाहिए। क्येांकि आधुनिक समाज को अवधारणात्मक स्थिति के समीप जितना आज का युवा है, तथा मौजूदा परिदृश्यों का जितना चिन्तन युवा के पास है वह लघुकथा के सृजनात्मक कौशल को निपुणता के साथ निखार सकता है, निखार रहा है। यह मन्तव्य इसलिए भी कि आज की पुरानी पीढ़ी कभी तो वह भी नयी पीढ़ी रही है।
प्रस्तुत पुस्तक में कमल चोपड़ा एक स्थान पर लघुकथा में दोहराव पर भी चिन्तित नजर आते हैं। इसका प्रमुख कारण लघुकथा लेखन में ‘विषयों’ की कभी बताते है। इसमें आगे वे यह भी कहते नजर आते हैं, ‘‘लघुकथा की शक्ति सूक्ष्म निरीक्षण में छुपी होती है।’’
समकालीन लघुकथा में लघुकथा के अभ्युत्थान के पीछे कमल चोपड़ा का मानना है कि, ‘‘सन् सत्तर के बाद सेे ही लघुकथा में निरन्तर परिवर्तन, प्रयोग किए, जो कि आज भी जारी है, कहा जा सकता है कि लघुकथा लेखक तभी से एक अलग अप्रोच को लेकर चले, परिणामतः आज लघुकथा की एक अलग पहचान बन पाना सम्भव हुआ।
वस्तुतः कमल चोपड़ा की ‘लघुकथा: सृजनात्मक सरोकार’’ हिन्दी लघुकथा की सृजन-प्रक्रिया को विवेचित करने वाली उपयोगी पुस्तक है। प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के प्राबल्य लघुकथाकारों को लघुकथाओं पर विशिष्ट विचार देखने को मिलते हैं बावजूद कतिपय नए लघुकथाकार की लघुकथाओं का रेखांकन भी कमल चोपड़ा करने में चुके नहीं है। लघुकथा की सामर्थ्य, सार्थकता और सम्भावना पर लघुकथा के अनेक मर्मज्ञों के विचारों से प्रमुखता के आधार पर अवगत कराया गया है, जो पुस्तक का जरूरी अंग प्रतीत होता है।
पुस्तक के अन्त तक आते-आते कमल चोपड़ा ग्रामीण लघुकथाएँ और तद्विषयक चुनौतियाँ और लघुकथाकारों के दायित्व पर भी तफसील में बात रखते हैं। यही सन्दर्भ प्रस्तुत पुस्तक के महत्व को और भी रेखांकित करता हैं।
अंत में मैं यही कहूँगा कि कमल चोपड़ा केवल और केवल लघुकथा के सृजनाकार नहीं है प्रत्युत लघुकथा-विधा की बनावट और बुनावट के पैरोकार भी है। कमल चोपड़ा लघुकथा के बहुआयामी होने के विश्लेषक ही नहीं है प्रत्युत लघुकथा में विषय वैविध्य को अभिलेखित किए जाने के पक्षधर हैं। कमल चोपड़ा लघुकथा के पारम्परिक लेखन के साथ उतने खड़े नहीं मिलते हैं जितने कमल चोपड़ा लघुकथा में नई तहजीब, नई अर्थवत्ता, नई भाषा-शिल्प-प्रयोग आदि के पक्षधर के रूप में उपस्थित हुए मिलते हैं।
लघुकथा: सृजन सरोकार: डॉ. कमल चोपड़ा, प्रकाशक दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर दिल्ली-110035; पृष्ठ संख्या 152, मूल्य: चार सौ रुपये< प्रथम संस्करण:2021
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