अचानक घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला तो सामने एक लड़की को खड़ा पाया। लड़की जवान तो थी ही, सुन्दर भी थी।
मैं अभी उसके चेहरे की ओर देख ही रहा था कि वह बोल उठी, “अंकल जी, निहारिका हो तो बुला दीजिये, प्लीज।”
“नीहारिका तो अभी यहाँ नहीं है, लेकिन मैं अब भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ।”
“मैं नीहारिका की सहेली हूँ। अभी हम दोनों ने एक साथ एमए में प्रवेश लिया है न। इधर से निकल रही थी तो सोचा कि उससे मिलती चलूँ।” लड़की बिना झिझक के बोली।
“अच्छी बात है। आइये, आप अन्दर बैठिये। नीहारिका आती ही होगी।” कहते हुए मैंने उसके लिए अन्दर आने का रास्ता छोड़ दिया।
“आंटी तो अन्दर होगी न?” आगे बढ़ने के लिए उसने अपना कदम ऊपर उठाते हुए पूछ लिया।
“वे भी नीहारिका के साथ ही गई हैं। आप झिझक क्यों रही है? अन्दर आइये, मैं तो आपके पापा जैसा ही हूँ। आइये, डरिये मत।” मैंने आग्रह किया।
“सच कह रहे हैं अंकल आप। आप हैं तो मेरे पापा जैसे ही, लेकिन पापा तो नहीं। एक बार भी अब तक आपके मुँह से मेरे लिए ‘बेटी’ शब्द नहीं निकला।” कहते हुए लड़की वापिस मुड़ी और झट से आगे बढ़ गई।
दायाँ हाथ एकाएक मेरे अपने गाल को सहलाने लगा,हालांकि वहाँ किसी थप्पड़ की मार तो बिल्कुल नहीं पड़ी थी।
-0- पवन आत्रेय, 864-ए/12
आजाद नगर कुरुक्षेत्र 136119
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