हमारे पड़ोस में दो घर छोड़कर विनायक जी का घर था। पेशे से वह वैद्य थे। बड़ा घर था सो घर पर ही क्लीनिक खोला हुआ था। घर के पिछवाड़े में जड़ी-बूटियाँ कूटकर दवाएँ बनाने का काम होता था। दवा लेने वालों की भीड़ लगी रहती थी। विनायक जी का काम इतना बढ़ गया कि उन्हें अब अपने काम में कोई हाथ बटाने वाला सहायक चाहिए । पुड़ियाँ बनाने के लिए जिस कबाड़ी से वे रद्दी ख़रीदते थे, उसी से विनायक जी ने कहा कि कोई अठ्ठारह- बीस बरस का लड़का हो, तो बताना मुझे अपने काम में हाथ बटाने के लिए चाहिए।
”डॉक्टर साहब मेरा अपना बेटा है भानु कहें तो उसे भेज दूँ।”
”कुछ पढ़ा- लिखा है?”
”पाँचवी तक पढ़ा है।”
”कोई काम वाम भी कर लेता है या—”
”कर लेता है डाक्टर साहब। पिछले चार साल से एक बड़े साहब के घर का काम कर रहा था। उनका तबादला दूसरे शहर हो गया, सो दो महीने से खाली बैठा है।”
”ठीक है। कल भेज देना।”
भानु अगले दिन्से आ गया। उसे दिल लगाकर काम करता देखकर विनायक जी बहुत खुश थे। वह भी धीरे-धीरे उनके साथ खुलने लगा था। एक दिन उसने पूछ लिया- ”डॉक्टर साहब आपने डॉक्टरी कहाँ से पढ़ी?”
हँसकर बोले- “अपने दादा से। दादा एक मशहूर वैद्य थे। स्कूल से आने के बाद बस उनके पास बैठ जाता था। उन्हीं को देख-देखकर काम सीख गया।”
घर के बरामदे में वहीं एक ओर बैठा भानु पुड़ियाँ बनाने के लिए काग़ज़ के टुकड़े काट रहा था। विनायक जी की बेटी को अपनी सहपाठिन के साथ दसवीं की परीक्षा के लिए तन्मयता से सामान्य ज्ञान के पेपर की तैयारी करते देखकर उसे बहुत अच्छा लग रहा था; क्योंकि वह स्वयं भी पढ़ने का शौकीन जो ठहरा। तभी तो घर जाकर रद्दी के गट्ठर से छाँटकर रखी पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें पढ़कर वह अपने पढ़ने का शौक पूरा कर लेता । उसे साहब के बेटे का ट्यूशन पढ़ना भी याद आ गया, जब मास्टर जी उसे पढ़ाते थे, तो कितनी उत्सुकता से वह उनके बरामदे में बैठकर मास्टर जी को पढ़ाते हुए ध्यान से सब सुनता रहता था।
इतने में उसने देखा कि कुछ प्रश्नों के उत्तर न मिलने पर वे दोनों परेशान हो रही थीं।
उन्हें परेशान होता देखकर बोला- “आप यदि बुरा न मानें, तो मुझे बताएँ अपने प्रश्न, शायद मैं कोई उत्तर दे पाऊँ।”
दोनों ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा – “पाँचवी कक्षा तक पढ़ा, वह भी सरकारी स्कूल से। भला हमारे प्रश्नों का क्या उत्तर देगा।”
“आप प्रश्न तो बताएँ, कोशिश करने में क्या हर्ज़ है।”
अपने एक-एक प्रश्न का सही उत्तर पाकर वे दोनों हैरान हो गईं। क्लीनिक में बैठे विनायक जी सब सुन रहे थे। उठकर आए और हैरान होते हुए बोले – “अरे भानु, तुमने सब कहाँ से सीखा?”
“हँसते हुए- बस वैसे ही डाक्टर साहब, जैसे आप डाक्टरी सीख गए।”
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