जब वह पहली पहली दफा आई थी, किवाड़ पूरा खुला था। फिर उस घर में जीना शुरू किया तो आधा किवाड़ ही खुला रहता । वह आधे किवाड़ का जीवन जीती रही। उस आधे किवाड़ में अधूरी नजर से पूरा जीवन जी लिया उसने। सारे बसंत हँस लिये। उस घर के आधे किवाड़ के पीछे सारे सावन भिगो दिए।
उस आधे किवाड़ से आती-जाती पूरी दुनिया निहारती। इच्छा तो होती, किवाड़ पूरे खोल ले, लेकिन रिवाज स्वतंत्रता से बड़े होते हैं। गुजरती बारातें, नाच-गाने सब कुछ आ किवाड़ से देखती रह जाती। उसका आधा जीवन उस आधे बंद किवाड़ के पीछे रिसता रहा। फिर धीरे-धीरे एक बंद संदूक की तरह हो गई।
एक दिन किवाड़ पूरा खुला, जिस तरह एक दिन वह पूरे खुले किवाड़ से भीतर आई थी, उस किवाड़ को पूरा खुला छोड़ हमेशा के लिए चली गई। आसपास की उम्रदार और बुजुर्ग उसे आज भी याद करते हैं, “मजाल है कभी वह पूरे किवाड़ खोल बाहर आई हो!”
मुझे याद आते हैं, उसके हारे हुए हाथों का आधे बंद किवाड़ का सहारा लिये, बग़ल में से पूरी दुनिया देखने का ढंग। शायद वह दुनिया नहीं, इस अपने टूटे घर, पूरे खुले किवाड़ का जीवन ही निहारती रही हो ।
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