नौवाँ पुरस्कार
रवि हर सुबह तैयार होकर आईने के सामने खड़ा होता। बाल ठीक करता, कॉलर सेट करता, और एक हल्की मुस्कान के साथ खुद को देखता और “परफेक्ट!” कहकर बाहर निकल जाता।
आईना रोज़ उसकी आदत से परिचित था।
पर आज अचानक उसने देखा कि रवि की मुस्कान थोड़ी थकी हुई थी, आँखों में हलकी झल्लाहट और होंठों पर बनावटीपन।
फिर भी रवि बोला — “परफेक्ट!”
आईने को खामोशी अखरने लगी।
वह सोचने लगा — कब से मैं बस चेहरा दिखा रहा हूँ… जबकि असल रवि तो मेरे पीछे छुपा बैठा है…उसके तनाव, दिखावे, जलन, दिखावटी रिश्ते – सब पीछे हैं।
उस दिन आईने ने खुद को चुपचाप दीवार से गिरा लिया।
रवि ने देखा, काँच टूटा पड़ा था। वह बोला — “ओह, अब एक नया आईना लाना पड़ेगा।”
पर उसे क्या पता,पुराना आईना गिरने से नहीं टूटा था, बल्कि सच्चाई थामे-थामे थक गया था।
.योगिता जोशी , जयपुर
8112215802