जून 2026

दस्तावेज़आँखें सारा सच नहीं देख पातीं     Posted: September 1, 2019

(विष्णु प्रभाकर से मुकेश शर्मा की बातचीत)

प्रश्न: लघुकथा का आप साहित्य में क्या स्थान पाते हैं अन्य विधाओं की तुलना में?

उत्तर: लघुकथा किसी-न-किसी रूप में अनादि काल से चल रही है। प्राचीन काल में  ॠषियों ने कुछ दृष्टांत लिखे थे, जिसे सर्वसाधारण भी समझ सकें। जैसे ‘सदा सच बोलो’ एक वाक्य है। लेकिन ‘सच बोलना’ है क्या? यह एक दृष्टांत के माध्यम से  अच्छी तरह समझाया जा सकता है। जैसे युधिष्ठिर का एक दृष्टांत प्रसिद्ध है।

            इसी प्रकार यदि दृष्टांतों को आज की भाषा में लिखा जाए, तो अच्छी लघुकथाएँ बन सकती हैं। वैसे लघुकथा को एक विधा मानकर अलग से आन्दोलन हुआ हो, ऐसा नहीं है। मुझे कोई आपत्ति नहीं है, अगर इसे अलग से मान लिया जाए, वैसे तो ये कथा के अन्तर्गत ही आती है। लघुकथा में कुछ वाक्यों में ही सारी बात स्प्ष्ट हो जाती है। अब साहित्य की हर विधा का रूप सूक्ष्म होता जा रहा है। लोगों के पास बड़े ग्रंथ पढ़ने के लिए समय नहीं रहा। है। मनुष्य अब युगों का सुख क्षणों में पा लेना चाहता है, इसीलिए लघुकथा भी युग की माँग है। अतः साहित्य में इसका स्थान स्थायी रूप से रहेगा।

प्रश्न: आपका मानना है कि लघुकथा का पंचतंत्र, बोध-कथाओं से प्राचीन सम्बन्ध है?

उत्तर: हाँ, ये लघुकथा का बीज रूप था और विकसित होने पर रूप तो बदलता ही रहता है। बीज की परिणति बीज है, फल नहीं। बीज कभी नष्ट नहीं होता। इसमें भी नए आयाम आएँगे,नई भाषा आएगी। यह कहना कि लघुकथा सन् पचहत्तर में ही शुरू हुई, एक दम्भ है। हम ये कह सकते  हैं कि अब इसका विकसित रूप आया है।

प्रश्न: पिछले बीस वर्षों में लिखी गई लघुकथाओं पर आपकी विश्लेषणात्मक टिप्पणी….?

उत्तर: देखिए, हर विधा में तीन चीजें जरूरी है-कथ्य, शैली और भाषा। कथ्य के अनुरूप ही, भाषा और शैली होनी चाहिए। लघुकथा का कथ्य सूक्ष्म और अर्थवक्ता है, अतः शब्दों का चयन भी इसके अनुरूप होना चाहिए। अतः इन चीजों की कसौटी पर हम उन लघुकथाओं को कस सकते हैं।

प्रश्न: लघुकथा की वर्तमान स्थिति आपको कैसी लग रही है?

उत्तर: वर्तमान स्थिति अच्छी लगती है। नदी उफनती है तो गन्ध साथ आ जाती है, किन्तु आगे चलकर जल साफ हो जाता है। कुछ समय बाद इसका शुद्ध और मौलिक रूप सामने आएगा। परम्परा से हम कट नहीं सकते।

            अपनी परदादी से अब अपनी पोती तक मैंने छह जनरेशन देखी हैं। यदि मेरी परदादी ही नहीं होती, तो अब मेरी पोती कहाँ से आ जाती। जबकि मेरी परदादी और पोती की मान्यताओं में फर्क है।

प्रश्न: आज इतनी अधिक लघुकथाएँ क्यों लिखी जा रही हैं?

उत्तर: ये लघुकथा के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक चीज है। ये दो कारणों से है-एक तो नए लेखकों का ध्यान लघुकथा की ओर अभी गया है और दूसरा यह कि लोग इसे आसान काम समझने लगे। जबकि किसी बात को सूक्ष्म रूप में कहना सार्थक तत्व देना-यह तो बहुत कठिन काम है। जब कि वो लोग कठिन काम तो करते नहीं हैं।

            आज की पीढ़ी से मेरी सबसे बड़ी शिकायत ये है कि साधना उनमें नहीं है। हमारी पीढ़ी के लोग साधना के पश्चात् लिखने लगे थे। एक मूल वाक्य याद रखना-‘‘दर्द सहने की यातना में से गुजरे बिना कोई कभी लेखक या कलाकार नहीं बन सकता।’’

प्रश्न: लघुकथा के आकार को लेकर समय-समय पर विवाद होता रहा है। आपके विचार से एक स्वस्थ लघुकथा का आकार कितना होना चाहिए?

उत्तर: मेरे विचार से दो-तीन लाइनों से दो पृष्ठ तक लघुकथा हो सकती है। यद्यपि दो पृष्ठ भी कुछ अधिक हैं, तो आप उसे छोटी कहानी कह लीजिए। लघुकथा का कथानक सूक्ष्म रूप में होता है।

प्रश्न: लघुकथा लिखते समय लेखक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर: कथ्य, भाषा, शैली तीनों चीजें अनिवार्य हैं। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक बातों का कहना। जैसे-छायावादी युग के कवि जब नारी के यौवन का वर्णन करते थे, तो नख से शिख तक हर चीज का वर्णन करते थे। कितना लम्बा-चौड़ा वर्णन करते थे। लेकिन शरत्चन्द ने नारी का वर्णन एक लाइन में किया-‘‘यौवन जैसे उसके शरीर में ठहर गया।’’ तो लघुकथा के लिए इस भाषा की जरूरत है।

प्रश्न: क्या किसी भी विधा को पुष्ट करने के लिए उसकी समीक्षा होना आवश्यक है?

उत्तर: बिल्कुल आवश्यक है। दरअसल लेखक अपनी सभी कमजोरियों को नहीं जान पाता। सही लेखक के लिए सही समीक्षक की बहुत आवश्यकता है। समीक्षक को पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए।

प्रश्न: लघुकथा की और अभी समीक्षक भी आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं, इसके क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर: दरअसल लघुकथा को लेकर समीक्षकों की सही राय अभी नहीं बन पाई है ,बहुत से इसे चुटकुलेेबाजी मानते हैं। अतः अभी समय लगेगा। जब कोई अद्भुत, असली लघुकथाओं का संग्रह निकाल देगा, तो लोगों का ध्यान जा सकता है।

प्रश्न: लघुकथा के समीक्षा पक्ष को पुष्ट करने के लिए लेखकों की क्या भूमिका हो सकती है?

उत्तर: सृजनात्मक लेखन, समीक्षा से अलग होता है। हमारेू जीवन की, हमारी रचनाओं की, हमारे साथियों की रचनाओं की समीक्षा करें, यह हमारे युग में आवश्यक नहीं था। हमारे बाद के युग में इसे आवश्यक मानने लगे थे। मेरा अब भी ये मत है कि चक्रव्यूह में न पड़कर अपने सृजन पक्ष पर ध्यान देना चाहिए। सही सृजक अपनी समीक्षाओं की ढेर सारी बुरी बातों में से अच्छी बातें ग्रहण कर लेगा।

प्रश्न: क्या किसी विधा के विकास के लिए आंदोलन जरूरी है?

उत्तर: नहीं, आन्दोलन जरूरी तो नहीं है। जैसे-जैसे विचार आगे बढ़ता है तो लोग अपनी बात कहते ही हैं। तो वो विकसित नहीं होगा तो पुष्ट भी नहीं होगा। ये सब एक सीमा तक जरूरी होते हैं। बाद में तो ये एक उफान की तरह हो जाते हैं, जिसका कोई अर्थ नहीं।

प्रश्न: लघुकथा को लेकर भी विचार-विमर्श होते रहे हें। एक आन्दोलन सा प्रतीत होता रहा है। आप इसे कैसा समझते हैं?

उत्तर: मैं इसे अच्छा नहीं समझता। लघुकथा का सृजन करना चाहिए, आपको, आप आन्दोलन क्यूँ करा रहे हैं।? अपनी बात जबरदस्ती क्यूँ मनवाते हैं? सृजन की शक्ति से अपनी बात मनवाइए।

            आँखें सारा सच नहीं देख पातीं। बल्कि मैं कहूँगा कि आँखें तो देखती ही नहीं हैं, देखता तो दिमाग है। जीवन के सत्य और कला के सत्य में फर्क होता है।

प्रश्न: नए लेखकों के लिए कोई सन्देश…..

उत्तर: बस यही कि साधना करें, ‘ताता’ लेकर न दौड़े। शरत्चन्द्र वाली बात कि ‘न लिखना सीखें।’

(सन्दर्भ: लघुकथा के आयाम: सम्पादक: मुकेश शर्मा)

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