“मैंने तुमसे कल रात भी कहा था मेधा, मुझे अपनी निजी बातें सार्वजनिक करने का कोई शौक नहीं है!”—सिंघानिया साहब ने चाय का कप मेज़ पर पटकते हुए कहा।
मेधा ने आश्चर्यचकित होकर अपनी माँ की तरफ़ देखा—“पापा, आप किस बारे में बात कर रहे हैं? मैंने तो किसी से कुछ नहीं कहा!”
“अच्छा? तो फिर तुम्हारे फोन से मेरी बैंक डिटेल्स और मेरी बीमारी का ज़िक्र रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप ग्रुप पर कैसे पहुँचा?” सिंघानिया साहब का चेहरा रंज और ग़ुस्से से लाल हो चुका था।
तभी उनका बेटा आया और बोला—“माँ, आपको ज़रा भी समझ नहीं है! आप अपनी बहू के बारे में हर बात फैमिली ग्रुप में लिख रही हैं?”
सिंघानिया जी की धर्मपत्नी अचरज से बोलीं—“बेटा, मैंने तो दो दिन से व्हाट्सऐप खोला भी नहीं है। आजकल तो मैं इंस्टाग्राम और ट्विटर ही ज़्यादा देखती हूँ।”
आपसी अविश्वास और शक की इस दहलीज़ पर सब लोग एक-दूसरे की तरफ़ झुँझलाते और बदगुमान होते हुए कमरे से बाहर निकल गए।
शाम के समय सिंघानिया जी के मित्र अनूप जी घर आए। सोफे पर एक छोटे-से शिशु को हाथ-पैर हिलाते और कूकते हुए देखकर अनूप जी चौंककर बोले—“अरे भाई! यह तुम्हारा पोता कब हुआ? हमें तो तुमने बुलाया ही नहीं!”
सिंघानिया जी मुस्कुराते हुए बोले—“अरे, यह तो आजकल की तकनीक द्वारा जनित शिशु है भाई! बेटा जब चीन गया था, तब वहीं से लाया था। इनकी उम्र नहीं बढ़ती। बाकी इंसानी मन की बच्चे की इच्छा शांत करने और खेलने-खिलाने के लिए पर्याप्त अच्छे खिलौने हैं ये।”
अनूप जी ने उस बिल्कुल वास्तविक शिशु जैसे लगते कृत्रिम रोबोटिक शिशु को अपने लैपटॉप से जोड़ा और उसकी गतिविधियों को देखते-देखते उनके चेहरे के भाव बदलने लगे। अनूप जी ने गंभीर स्वर में सिंघानिया जी को आवाज़ लगाई—“लीजिए सिंघानिया जी, आपका असली गुनहगार मिल गया—असंदिग्ध AI बग।”
सिंघानिया जी को स्क्रीन पर सभी के फोन पर स्वतः जाते हुए संदेश दिखाई देने लगे। स्क्रीन पर नीली लाइट में टिमटिमाता हुआ संदेश आ रहा था—AI System Error: Unauthorized Message Generation.
उसी समय उस कृत्रिम शिशु की आँखें भी नीली से लाल हो गईं—एकदम शैतानी, जिन्न की भाँति।
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