गढ़वाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट
वे दिन सुर्ज भौत थक्यूँ– थक्यूँ धार माँ आई। रमेशै कि तरौं वु बि जन कि रात भर उणदु रै हो।
रमेश पूछि–पूछि क हारि गे छौ। घौरवळी घूम–फिरि क एक इ जवाब देंदी, ‘‘मि तैं नी पता अस्पताळ कनक्वे पौंछि; कैन पौंछाई। होश औंदु इ तुम तैं फोन करवै यालि छौ।’’
वु बार–बार पूछदु, ‘‘तु सच–सच किलै नि बतै देंदी ? जु ह्वे गी , स्यु ह्वे गी।’’
‘‘कुछ ह्वे हो त बतौं।’’
‘‘देख! इखमाँ त्यारू क्वी दोष नी च। अस्पताल लि जाँण से पैलि वे त्वी तैं हौर कख लिगी छा?’’
‘‘मिन बतायी न कि अँध्यरा का कारण सामणी पुड़याँ ढुंगा पर ठोकर लगदु इ मि बेहोश ह्वे गे छौ। होश आई त अस्पताळ माँ छौ।’’
‘‘डॉक्टर न बतायी छौ कि तीन ज्वाँन छ्वारा त्वी तैं भरती करै गे छा। तु सच–सच किलै नी बतै देंदी? मि वे तरौं कु आदिम नि छौं , जन तु सुचणी छैं। आखिर त्यारू घौरवळु छौं।’’
‘‘जब कुछ ह्वे इ नी च त क्या बताँण? तुम मि पर बिस्वास किलै नी छाँ कन्ना?’’
रात भर घौरवळि–घौरवळा क बीच बिस्वास बवाति कटणु राई।
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