
घर की दीवारें कभी खाली नहीं थीं।
उन पर उसके अधूरे ख़्वाब टँगे रहते थे—जैसे तस्वीरें टँगी हों, जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग कोई और ही संसार हो। किसी में दूर तक जाती सड़क थी, किसी में खुला आसमान, तो किसी में वह स्वयं थी, अपने ही सपनों के बीच खड़ी हुई। वक्त बीतता गया, और दीवारों पर टँगे वे ख़्वाब धूल पकड़ते चले गए। रोज़ झाड़ू लगाते हुए वह उन्हें देखती, पर उतारने का साहस नहीं जुटा पाती थी।
आज बहुत अरसे बाद उसने वे सारे अधूरे ख़्वाब उतार लिये। धूल से भरे, धुँधलाए हुए। उसने उन्हें तह किया और एक बड़े से झोले में भर लिया। झोला भारी नहीं था, पर उठाते ही उसके कंधे झुक गए—शायद इसलिए कि ख़्वाबों का वजन उम्र के साथ बढ़ चला था। अब वह उन्हें बेचने जा रही थी किसी कबाड़ी बाज़ार में।
बाज़ार में लोग टूटे सामान के ढेर लगाकर बैठे थे। उसने भी झोला खोलकर अपने ख़्वाब उलट दिए। ख़्वाब पहचान में नहीं आते इसलिए किसी ने पूछा नहीं कि ये क्या हैं। मोल-भाव करने की उसे जरूरत नहीं लगी। ख़्वाबों की क़ीमत उसने पहले ही तय कर ली थी क्योंकि उसे पता था कि उन टूटे हुए ख़्वाबों की क़ीमत वहाँ बहुत कम लगाई जाएगी—पर यह सौदा ज़रूरी था। उसे बदले में कुछ नए ख़्वाब चाहिए।
वापसी में उसके झोले में अब और तरह के ख़्वाब थे। अपने लिए नहीं—अपनों के लिए। बूढ़े, बीमार पिता के लिए उसने एक जोड़ी मज़बूत जूते, साफ़ दिखाने वाला चश्मा और बेहतर अस्पताल व दवाइयाँ चुनीं। माँ के लिए एक नई साड़ी का ख़्वाब, जो पहनकर वह किसी रिश्तेदारी में मुस्कराती हुई जा सके। भाई के लिए एक शिक्षित रोज़गार का ख़्वाब और बहन के लिए उसने चुना सबसे चमकीला ख़्वाब —पढ़ने का, सोचने का और अपनी इच्छाओं को पंख लगाकर उड़ने का। सब कुछ उसे ठीक लगा और ज़रूरी भी।
घर लौटी तो दीवारों पर अब उसके सपनों की तस्वीरें नहीं थीं। उस रात खाली दीवारों ने उससे पूछा—“क्या यह त्याग है या धीरे-धीरे मिट जाना या फिर अपने ख़्वाबों की क़ीमत रिश्तों की ज़रूरतों से चुकाना?” वह कुछ न बोली। बस कोने में रखे उस झोले को देखकर मुस्कुरा दी जिसमें रिश्तों के ख़्वाब थे—जीते-जागते, साँस लेते हुए। घर की दीवारें फिर से सजने लगीं। उसने अमीर होने का तरीका जो चुन लिया था।