बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। कच्ची छत से पानी की धाराएँ निरंतर बह रहीं थीं। टपकते पानी के लिए घर में जगह-जगह रखे छोटे बड़े बर्तन भी बार-बार भर जाते थे। उसके बीवी-बच्चे एक कोने में दुबके बैठे थे। परेशानी के इसी आलम में कवि सुधाकर टपकती हुई छत के लिए बाज़ार से प्लास्टिक की तरपाल ख़रीदने चल पड़ा। चौक पर पहुँचते ही पीछे से किसी ने आवाज़ दी,
“सुधाकर जी, ज़रा रुकिए।” आवाज़ देने वाला उसका एक परिचित लेखक मित्र था।
“जी भाई साहिब, कहिए।”
“अरे भाई कहाँ रहते हैं आजकल? परसों सावन कवि सम्मलेन है। मैं चाहता हूँ कि आप बरसात पर कोई ऐसा फड़कता हुआ गीत पेश करें ताकि लोगबाग मस्ती में झूम उठें।”
सावन और बरसात का नाम सुनते ही घर टपकती हुई छत उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई, टपकते हुए पानी को सँभालने में असमर्थ बर्तन उसे मुँह चिढ़ाने लगे।
“क्या सोच रहे हैं? अरे देश के बड़े-बड़े कवियों की मौजूदगी में कविता पाठ करना तो बड़े गर्व की बात है।”
“वो सब तो ठीक है, लेकिन… मुझसे झूठ नहीं बोला जाएगा।”
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जून 2026
देशअपने-अपने सावन Posted: May 1, 2023
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