‘‘आप नाराज़ हैं मुझसे?’’
‘‘नहीं तो ! क्यों?’
‘‘सच में नाराज़ नहीं हैं? ‘‘
‘‘ऐसा क्यों लगा? ‘‘
‘‘किसी ने कहा कि आप मेरी किसी बात से नाराज़ हैं, आपने कहा कि मैं आपके समूह में हूँ; लेकिन दूसरे समूह की भी सहायता कर रही हूँ इसलिए।’’
‘‘मैं ऐसा क्यों कहूँगी। आप स्वतंत्र हैं। आप हमारे साथ भी जुड़ी हैं उनके साथ भी तो मैं ऐसा कह ही नहीं सकती’’
‘‘मुझे भी यही लगा कि आप ऐसा नहीं कह सकती; इसलिए मैंने सोचा सीधा आपसे ही पूछ लेती हूँ।’’
‘‘अच्छा किया पूछ लिया। मैं किसी से नाराज़ होती नहीं, बस एक व्यक्ति को छोड़कर। सारी नाराज़गी उसी पर उतरती है, जो कहना होता है उसी से कहती हूँ।’’
‘‘यह भी अच्छा है। कोई तो है, जिससे आप सब कुछ कह सकती हैं। मेरे पास तो वह एक भी नहीं है।’’
‘‘यह भी अच्छा है। कभी किसी का भी ना होना, ज़्यादा सुखकर होता है, किसी के होने से।’’