“पनीर की और सब्जी है क्या?” निलेश माँ की ओर देखता बोला।

पतीले की तली में बची सब्जी कटोरी में समेट माँ खाने ही जा रही थी कि निलेश की आवाज पर अपनी कटोरी उसकी ओर बढ़ा दी।
“ये है न!! मैंनें तो खत्म करने के चक्कर में समेट ली।” माँ की ममता बोल उठी।
“और तुम कैसे खाओगी?”निलेश के चेहरे पर नाराजगी के भाव झलके।
“अरे!! शाम को नाश्ता ज्यादा हो गया था। मैंने कहा न खत्म करने के चक्कर में कटोरी में परस ली थी।” माँ जोर देते बोली।
“पता नहीं आप रोज इतना नाप तौलकर क्यों बनाती है। कभी दाल कम, कभी चावल, कभी सब्जी कम। ढंग से खाना भी न खा पाओ। आप ही खाइए, मुझे नहीं खाना।” परसी थाली छोड़ निलेश गुस्से में उठ गया।
माँ कसमसाकर रह गई। उसे मालूम था कि अब वे निलेश अब दुबारा बुलाए तब भी वह नहीं आएगा।
निलेश गुस्से में अपने कमरे में जाकर पढ़ने बैठ गया। थोड़ी देर बाद ही शलभ आकर निलेश की मेज़ के पास आकर खड़ा हो उसकी किताबें उलट- पलटकर देखने लगा।
“ ओह!!! छह सौ की!!! बड़ी महँगी हो गई किताबें।”-शलभ के चेहरे पर आश्चर्य आ गया।
“ये तो सेंकेड हैंड ली है भैया। दो तीन किताबों का तो पूरा कोर्स ही बदल दिया, नई लेनी पड़ी।” निलेश जानकारी देता बोला।
“अच्छा!!! देखें।” कहता शलभ उसकी नई किताबों के प्राइस टैग को देखने लगा।
“बार रे!! तीन तीन हजार की!!” शलभ के चेहरे पर अचंभा जड़ा था।
“हाँ,पापा ने कहा है कि किताबें लेने में कंजूसी न करना।” निलेश समझदारी दिखाते बोला।
“कभी सोचा तुमने कि महीने की आमदनी केवल बीस हजार होने पर माँ क्यों अपने खाने में कभी दाल,कभी चावल, कभी सब्जी की कंजूसी कर जाती है। खाना छोड़ने से पहले यह बात जरूर सोचना।”- कहता शलभ निलेश की पीठ थपथपाता कमरे के बाहर निकल गया।
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