“अरे रमुआ! ई बार की को वोट दई हो?”
खेत की मेड़ पर पेड़ की छाँव तले लगभग झूलती हुई सी टूटी हुई चारपाई
पर पसरे हुए जमींदार ने हुक्के का धुँवा आसमान में छोड़ते हुए पूछा।
“माई बाप! हमार वोट तो अन्नदाता को ही जई है।” बिना रुके खेत मे कस्सी चलाते-चलाते रमुआ ने जवाब दिया।
जमींदार का
पारा सातवें आसमान पर था, “साले नमक हराम, ईका मतबल तू हमें वोट नाही देईबे।”
लघुकथा.com
अक्तुबर 2026
देशअन्नदाता Posted: September 1, 2019
© Copyright Infirmation Goes Here. All Rights Reserved.
Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine