[ ओमान}
अनुवाद-आलोक कुमार सातपुते
अगर मैं कल मर जाऊँ तो मुझे बिना कफ़न के दफ़ना देना। मेरे पैसे से मेरे लिए कफ़न खरीदने की बजाय, मेरे पड़ोसी रशीद के लिए एक जोड़ी कपड़े खरीद देना, क्योंकि मैं उसे हमेशा फटे-पुराने कपड़ों में ही देखता रहा हूँ। मेरे लिये शोक और मेरे पापों के निवारण के लिए न तो किसी किस्म की शोक-सभा, न ही मृत्युभोज का आयोजन किया जाये। विलाप आदि किए जाने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। धार्मिक स्थलों में दान न देकर, भूखों और वास्तव में ज़रूरतमंदों को मेरे रुपये दान किये जाएँ। मौलवी साहब ने उस मृतक के वसीयतनामे के ऊपर लिखित आखरी हिस्से को पढ़ा और – “मृतक एक निहायत ही असभ्य, अधार्मिक व्यक्ति था। और इस तरह के एक अधार्मिक व्यक्तियों के लिए किसी भी किस्म की अंतिम संस्कार प्रार्थना नहीं की जा सकती।” यह कहते हुए वहाँ से बिना प्रार्थना किए चले गए।