–बाबू! बुरा तो नहीं मानोगे?
–नहीं! कहो, क्या बात है?
–अब आपकी चप्पल की लाइफ पूरी हो चुकी ! इस बार तो गाँठ देता हूँ। आगे मुश्किल है ! फिर नई ले लेना! मैं गाँठ नहीं पाऊँगा!
–अरे! चप्पल को क्या हुआ? थोड़ी सी तो ठीक करनी है!
–वही तो कहा, बाबू जी! थोड़ी थोड़ी करते भी टांके लगाऊँ तो आंखें जैसे इसी में टँक जाती हैं। आपको क्या है, नई ले लेना, बाबू जी! अब तो बहुत ऑपरेशन कर लिए इसके ! अब इसकी लाइफ नहीं बची!
–ठीक है, मैं तो तुम्हारे बारे में सोच रहा था! अब काम ही कितना बचा है तुम्हारे पास!
–हां बाबू जी! काम तो पहले रेडिमेड जूतों, चप्पलों ने ले लिया ! अब रिपेयर भी कम ही आती है! लोग बाग घर पर ही जूते पालिश कर लेते हैं, पर आता हूँ, तो बाज़ार में आप जैसे लोगों से दिल बहल जाता है! और तो क्या! काम ही कहां बचा है?
–फिर गुजारा कैसे?
–बेटा पढ़ लिख गया, नौकरी लग गयी! बस, उसका सहारा ! आप बाबू जी! कैसे दिन बिताते हैं?
–बस, तुम्हारी तरह ! कुछ इधर बैठ लिया, कुछ उधर! निकल जाता है, दिन!
–कैसे?
–दिनों की मरम्मत करके, गाँठें लगाते, कभी दुख की, कभी सुख की !
–लो, बाबू, आपकी चप्पल तैयार!
–ठीक है। पैसे कितने?
– कैसे पैसे? यह तो इनका अंतिम सफ़र है।
बाबू की आँखें भीग गईं अपनी चप्पल को आखिरी बार देखकर !
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लघुकथा.com
जून 2026
देशअंतिम सफ़र Posted: September 1, 2024
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