हिंदी साहित्य में लघुकथा विधा मेरी पसंदीदा विधा है मैं जीवन – यथार्थ से जुड़ी विसंगतियों को इंगित करती रचनाओं को अधिकतर पसंद करता हूं। जीवन तथा समाज के यथार्थ का पोस्टमार्टम करती रचनाएँ अपने दिल के अधिक करीब पाता हूँ । वरिष्ठ और मेरे समकालीन बहुत से लघुकथाकार हैं, जिनकी लघुकथाएँ मुझे याद आ रही हैं।इनमें से लघुकथा डॉट कॉम के स्तंभ ‘मेरी पसंद’ हेतु किन्हीं दो लघुकथाओं का चयन करना बड़ा ही मुश्किल काम है। फिर भी जो रचना अपनी रचनात्मकता के कारन अंतर्मन तक उतर जाती हैं और देर तक अंतर्मन की तहों में जिंदा रहती हैं, ऐसी रचना को पसंदीदा रचना हेतु चुना जा सकता है।मेरी पसंद की बहुत सी रचनाओं में, जो यहाँ इस स्तम्भ हेतु याद आ रही हैं,उनमे पहली है रतन चंद्र रत्नेश की ‘विडंबना’,और दूसरी जगदीश राय कुलरियाँ की ‘कीमत’
रतन चंद्र रत्नेश जी की ‘विडंबना’ एक सार्थक और समाज सापेक्षता संदर्भित रचना है। इसमें रचनाकार ने एक अध्यापक के अंतर्मन की व्यथा को बखूबी उजागर किया है। अपनी रचनात्मकता में वर्तमान युग की विडंबना, कि सरकारी विद्यालयों में कार्यरत् शिक्षक विद्यादान की अपेक्षा दूसरे कामों में इस तरह से उलझा दिए गए हैं कि उन्हें अपने मुख्य काम अध्यापन के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिलता सरकार के बाकी कामों को करते-करते ही पूरा साल बीत जाता है। मुझे यह लघुकथा इसलिए भी पसंद है कि मैं स्वयं एक अध्यापक हूँ । इस लघुकथा में ऐसे लगता है, जैसे रचनाकार ने मेरे मन की बात को कह दिया हो। सचमुच यह पूरे शिक्षक समाज एवं समाज के लिए विडंबना ही है। अध्यापक होने के कारण मुझे भी ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ा है। लघुकथा का शीर्षक उचित है और रचना अपने उद्देश्य में सफल हुई है।
मेरी पसंदीदा रचना में दूसरी रचना जगदीश राय कुलरियाँ की ‘कीमत’ है। यहॉँ रचनाकार ने पूँजीपतियों के द्वारा प्रवासी मजदूरों के शोषण की दर्दनाक तस्वीर पेश की है। गरीबी की मार झेलते प्रवासी मजदूरों के घर वाले किसी दुर्घटना में किसी अपने को खो देने पर दस -बीस हज़ार मुआवजा लेने पर समझौता कर लेते हैं,जबकि स्थानीय लोग लाखों की बात करते हैं। इस मजबूरी का सेठ रामलाल खूब फायदा उठाता है और जान- बूझकर स्थानीय मजदूरों को काम पर नहीं रखता। दूसरे गरीब मजदूरों की जिंदगी से खेलने वाले का अपना बेटा घर आने के लिए थोड़ी- सी देर कर देता है तो उसकी मां व्याकुल हो जाती है। प्रवासी मजदूरों के शोषण का यह विकृत रूप वर्तमान युग का यथार्थ है । इस रचना का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रभावित करता है,सेठ का अपना बेटा,जो पिता की निर्मम सोच से बिलकुल अनभिज्ञ है,पहली बार फैक्टरी गया है। संवादों से स्पष्ट है -वह भोला है, व्यापार के दाँव-पेंच से अनभिज्ञ है, जबकि पिता का सोच क्रूरता की तमाम सीमाएँ लाँघ चुका है, रचना इस ओर भी हमारा ध्यान खींचती है कि सेठ रामलाल जैसे पिता अपनी संतान को अपने जैसा बनाकर ही ख़ुशी महसूस करते हैं।
-0-
1-विडंबना/रतन चंद रत्नेश
…..तो आप अध्यापक हैं। यानी देश की भावी पीढ़ी को नई दिशा प्रदान करते हैं। अध्यापक गुरु होता है जो बच्चों का जीवन संवारता है। न जाने कितने युवक आपकी छत्रछाया में ज्ञान अर्जन कर देश को आगे ले जाने में सेवारत होंगे। शायद हां शायद नहीं। जो सफल रहे उनके अपने परिश्रम अधिक मायने रखते हैं। हमें शिक्षा दान का अवसर ही कहां मिल पाता है। शिक्षक समुदाय के प्रति प्रशंसा भाव रखने वाले व्यक्ति के चेहरे पर असमंजस के भाव तैरने लगे। इसके पहले कि वह खुलकर कुछ जानना चाहता अध्यापक ने स्वयं सच का पर्दा हटाकर रख दिया। महाशय हमें जो तनख्वाह सरकार से मिलती है वह बच्चों को पढ़ाने के लिए नहीं मिलती। साल भर बच्चों को पढ़ाने के बजाय हम दूसरे कामों में अधिक व्यस्त रहते हैं। जैसे कि वोट बनाने बनवाने कटवाने फोटो पहचान पत्र बनाने जनगणना करने सर्व शिक्षा अभियान को गति देने में। बाकी जो समय बचता है वह सरकारी फंक्शन करने में नेताओं की आवभगत व भीड़ इकट्ठा करने आदि में ही बीत जाता है।
-0-
2- कीमत/ जगदीश राय कुलरियां
“मैंने कहा जी आप दारु पीने में लगे हो। पता है समय कितना हो गया। रात के बारह बजने वाले हैं । अपना श्याम आज पहली बार फैक्ट्री गया है और अब तक नहीं आया । मेरा मन तो बहुत घबरा रहा है ।” भागवंती ने अपने पति सेठ रामलाल से कहा ।
“वह कौन सा बच्चा है ।आ जाएगा ।तू तो ऐसे ही घबरा रही है। थोड़ी देर और देख ले नहीं तो फोन करके पता कर लूंगा।”
कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी तो भागवंती को चैन मिला। “क्यों बेटा इतनी देर कर दी। आजकल वक्त बहुत बुरा है ।मेरी तो जान ही मुट्ठी में आई हुई थी।” भागवंती बेटे से बोली।
“अरे कोई फोन ही कर दिया कर’ तेरी मां चिंता कर रही थी । ‘अच्छा बता तुझे अपनी फैक्ट्री कैसी लगी ।” रामलाल ने बेटे से कहा ।
‘फैक्ट्री तो ठीक है पापा पर मुझे यह बताओ की फैक्ट्री में सभी प्रवासी मजदूर ही क्यों रखे हुए हैं ?जबकि हमारे पंजाबी लोग बेरोजगार फिर रहे हैं।”
“अरे बेटे अभी तेरी समझ में नहीं आएंगी ये बातें ।”
“नहीं पापा बताओ।”
” बेटे तुझे पता है कि अपनी फैक्ट्री में कैसा काम है। जरा सी लापरवाही से आदमी की मौत हो जाती है। अगर कोई प्रवासी मजदूर मर जाए तो ये दस बीस हजार लेकर समझौता कर लेते हैं। लेकिन अपने वाले तो लाखों की बात करते हैं।” सेठ रामलाल ने खचरी हंसी हंसते हुए शराब का एक और पैग अपने गले के नीचे उतार लिया ।
–0-