हिन्दी-लघुकथा के विकास में जिन महत्त्वपूर्ण लघुकथाकारों ने अपना योग- दान दिया है, उन नामों में उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जायेगा । उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ हिन्दी-कथा साहित्य में प्रेमचन्द के आदर्शोन्मुख यथार्थ- बाद के विकास-क्रम में यथार्थवादी परम्परा के कथाकार हैं। अश्क जी के समस्त कथा-साहित्य का अवलोकन करने से यह पता चलता है कि उन्होने अपने कया- साहित्य में सामाजिक और व्यक्तिक जीवन के कटु-मधु अनुभव, राग-द्वेष, प्रेम- ईर्ष्या यानि जीवन और समाज का जो खुरदरा यथार्थ उनके सामने आया है, उसे अपने कथा-साहित्य का आधार बनाया है। हिन्दी में कहानी के अलावा उन्होंने कुछ लघुकथाएँ भी लिखी है। अपने कहानी-संकलन ‘सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ’ की भूमिका ‘मेरे कहानी लेखन के बत्तीस वर्ष’ उन्होंने लिखा है- ‘इन बत्तीस वर्षों में गम्भीर कहानियों के अतिरिक्त मैंने दो तरह की कहानियाँ और लिखी हैं। लघु कथाएँ, जिन्हें उर्दू में ‘अफसर्साचे’ कहते हैं। समाचार-पत्र के एक डेढ़ कॉलम की कहानी । इनमें बारह-पन्द्र पंक्ति की कहानी से लेकर पुस्तक के तीन-चार पृष्ठों तक की कहानियाँ हैं। गम्भीर भी हैं और हास्य-व्यंग्य भरी भी ।’ (पृ-53) । ‘अश्क’ जी के इन विचारों को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि लघुकथा लेखन का आरम्भ उन्होंने अनजाने में नहीं किया, बल्कि उनके सामने लघुकथा का स्वरुप और विषय-वस्तु स्पष्ट थे । और यह वो समय था जब हिन्दी-लघुकथा अपने शंशव काल में थी। यानी तोसरे दशक का उत्तर्राद्ध ।
उपेन्द्रनाथ अश्क ने लघुकथा-लेखन का शुभारम्भ रन् 1929 से किया । उनकी पहली लघुकथा है ‘जादूगरनी’ । इसके बाद तो समय-समय पर उन्होंने लघुकथाएँ लिखीं । अपनी लघुकथाओं के विषय में उन्होंने लिखा- ‘मेरी पहली लघुकथाएँ रोमानी थीं, फिर सामाजिक फिर यथार्थवादी फिर व्यंग्य पूर्ण, फिर हास्य-रस-भरी । जैसे-जैसे मेरी कहानियों की शैली बदलती गयी, मेरी लघुकथाओं की वस्तु और शैली बदलती गयी । मैंने अब तक कोई पच्चीस-एक लघुकथाएँ लिखी है। इनमें से कुछ बड़ी लोकप्रिय हुई । बहुत छोटी कथाओं में ‘अमर खोज’, ‘नमक ज्यादा है’, ‘केवल जाति के लिए’, ‘शादी’, ‘गिलट’, अच्छी बनीं। लघुकथाओं में ‘भाई,’ ‘संवाददाता’, ‘आर्टिस्ट’, ‘बगूले’ ‘फतूर’, ‘अस्तु’ ‘जब सन्त राम ने बेलना उठाया’, ‘छिन्द्रान्वेषी’, ‘आ लड़ाई आ’ और ‘ज्ञानी’ बहुत अच्छी उत्तरी ।सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ – पृ०-54) ऊपर के उद्धरण को देखने से जो बात स्पष्ट रूप से हमारी दृष्टि में आती है वो यह कि उपेन्द्रनाथ अरक ने हिन्दी- कथा-लेखन में ‘लघुकथा’ लेखन, अनजाने नहीं बल्कि पूरे होशो बह्वादश में किया । उनके सामने लघुकथा का शिल्प-शैली उसका स्वरुप और आकार सब कुछ स्पष्ट था। यह हिन्दी-लघु कथा लेखन के लिए एक सुखद स्थिति है। इनकी रचनाओं को पढ़कर हिन्दी-लघु कथा कि विकास क्रम की प्रौढ़ता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
‘सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ’ संकलन में उनकी कुल चौदह लघु कथाएं संकलित हैं। इन लघु कथाओं पर उनके आत्मकथ्य के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए, तभी रचनाओं के साथ न्याय किया जा सकता है। क्योंकि लेखक खुद स्वीकारता है कि उसने कुछ रोमानी, कुछ सामाजिक कुछ यथार्थवादी और कुछ हास्य-व्यंग्य की लघुकथाएँ लिखी हैं। मैं उनके इन्हीं विचारों के तहत लघुकथाओं का निरूपण- विवेचन करूंगा ताकि उनके स्वरूप-शिल्प पर बातचीत की जा सके। उपयुक्त संकलन में संकलित लघु कथाओं का रचना-काल 1932 से सन् 1948 तक का है। ‘अश्क’ जी ने सामाजिक यथार्थवाद को अपनी रचनाओं को आधार बनाया है। समाज में दोहरे चरित्र जीनेवाले लोगों पर उन्होंने अपनी पैनी कलम चलायी है। ‘केवल जाति के लिए’ और ‘गिलट’ लघुकथाओं में ऐसे ही दोहरे चरित्रवाले लोगों की खबर ली गयी है। ‘केवल जाति के लिए’ शर्मा जी पंडित दीनदयाल के पुविवाह की बात पर उन्हें काफी भला बुरा कहते हैं किन्तु जब उनकी सहर्घामनी का स्वर्गवास होता है। शर्माजी तुरन्त अपनी शादी कर लेते हैं। लोगों के पूछने पर शर्मा जी उन्हें उत्तर देते हैं- एक हिन्दू नारी के भविष्य का प्रश्न था जरा भी देर करता तो उसका जीवन नष्ट हो जाता। उसका बाप उसे एक वूड़े खूसट के हाथ बेच देता। मैंने उसे दो सौ रुपया अधिक दिया और अबला के जीवन की रक्षा की। शर्माजी का यह कथन उनके मनोविचारों और उनके चरित्र को उजागार करता है।
कलाकार का मन बड़ा ही तुनक मिजाज होता है तथा स्वाभिमानी भी । ‘आर्टिस्ट’ लघुकथा एक आर्टिस्ट के इसी मनोभावो को उजागर करती है, तो ‘डाकी’ शुद्ध रूप से पारिवारिक और हास्य-रस की लघुकथा है। वहीं ‘गिलट’ में दो अंगुठियों के संवाद के माध्यम से लेखक ने दोहरे चरित्र ओढ़कर जीने बालों पर व्यंग्य किया है। ‘दो आने की मिठाई’ एक बच्चे और क्रूर सामंती मिजाज वाले रइस खान बहादुर की कहानी है। जिसमें बिना सोचे समझे खान अपने
नौकर के साथ क्रूर व्यवहार करते हैं। किन्तु जब यह अहसास होता है कि वह गलत कार्य उनके छोटे बेटे ने किया है, तो वे पिघल जाते हैं और उपेक्षा की दृष्टि से नौकरानी की तरफ दो आने फेंकते हुए कहते हैं उसे कह दे हैं-टें करना बन्द कर दे, मैंने उसे माफ कर दिया, चल के काम शुरू कर दे। दो अने की बोलना मिठाई खा ले । खान बहादुर का यह कथन उनके सम्पूर्ण दोहरे चरित्र को उजागर करके रख देता है। ‘फतूर’ लघु कथा में भी एक मुसलमान जमींदार के धोक्रे चरित्र की कलई खोली गयी है। इसमें एक महाशय अपनी अतिशय उदारता और अपने धर्म के खुलेपन की चर्चा करते नहीं अघाते किन्तु उसी समय उनका माली आता है जिसका बाप टायफायड का मरीज है उसके इलाज की बात वह उनसे कहता है वे उसे रुपये देकर जल्द रुखसत करते हैं और अपने बेटे से पूछते हैं कि टायफायड छूत की बीमारी तो नहीं है। और उस जगह को जमादार से साफ कराने को कह उसकी जगह कोई दूसरा माली रख लेने की बात कहते हैं और म्युनिसिपल कमिटी के डाक्टर से रूम को डिसइन्फेक्ट कराने को कहते हैं। उनका यह दोहरा व्यवहार उनके दोहरे चरित्र को नंगा कर देता है। ‘नमक ज्यादा है’ एक गरीब कामगार की जो अस्वस्थ होने से नौकरी से निकाल दिया गया है किंतु पुराने मालिक की दया पर जिंदा है जो रोज उसे खाने के लिए पैसा देता है उसके स्वाभिमान की कथा है। ‘पछतावा’ महज हास्य-व्यंग्य की चीज बनकर रह गयी है वहीं ‘प्रचारमंत्री’ में उन हिन्दी-सेवियों और प्रचारकों के ऊपर व्यंग्य किया गया है जो अपने को हिन्दी का अधिकारी विद्वान समझते हैं। ‘बगुले’ लघु कथा एक गरीब किसान के आशा-आकांक्षा की कहानी है जो प्रकृति प्रकोप द्वारा धाराशायी कर दिया जाता है ।
आर्थिक दवाव और मजबूरियाँ अगर रिश्तों संवेदना और मानवीयता उस टूटते रिश्तों को और ‘भाई’ लघु कथा ऐसे ही आर्थिक दबाव को झेलते एक में दरार पैदा करते हैं तो मजबूती प्रदान करती है । परिवार की मार्मिक कथा है। इस कथा में भाई चुपचाप अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देकर अपनी बहन को आर्थिक संकटों से उबारता है- उसकी इज्जत बचाता है। और पाठक के हृदय को झकझोर देता है।
‘स्पोर्टसमैन’ पुत्र-प्रेम में अन्धे एक पिता की कथा है, जिसमें उसका पुत्र एक दूसरे खिलाड़ी के साथ वैडमिंटन खेलता है। उसका पुत्र हारने लगता है तो उसका पिता खुद निर्णायक बन जाता है किन्तु अन्ततोगत्वा उसका पुत्र हार जाता है। उसके पिता को बड़ी चोट पहुँचती है किन्तु उसका लड़का अपनी हार से प्रसन्न होता है। वह अपने पिता के पास जाकर धीरे से कहता है- ‘मुझे खेद है, मैं जीत न सका, पर वह शटल नेट में से होकर ही गयी थी और प्वाइण्ट मेरा न था। मैं जीत जाता तो मुझे जरा भी खुशी न होती।’ उसके भीतर छिपे स्पोर्टसमैन स्पिरिट को उजागर करके उसके चरित्र को ऊँचा उठा देता है।
‘संवाददाता’ छोटे कस्बे के एक स्थानीय प्रेस संवाददाता की कया है जो अपने संवाददाता होने के बल पर समाज में अपना विशिष्ट स्थान बनाता, स्थानीय समाचारों को छपवाकर लोगों की नजरों में आदर का पात्र बना रहता है किन्तु स्थिति की असलियत तब उजागर होती है, जब खुद उसके घर में आग लगती है वह उम समाचार को तमाम अखबारों में भेजता है और वह समाचार कहीं भी नहीं छपता है। आखिर तीन दिन बाद वह समाचार एक अखबार में उपेक्षित जगह पर छपा । उसे देखकर संवाददाता को काफी गुस्सा आता है। लगता था उसके जले हुए घर की दीवारें उसकी स्थिति पर ठहाका लगाकर हँस रही थी ।
‘ज्ञानी’ लघुकथा में सांप्रदायिकता को मूलरूप में आधार बनाया गया है एवं ज्ञानी जी जैसे सफेदपोशों के चरित्र को उजागर करने की सफल कोशिश की गयी है। करतार सिंह धार्मिक आस्था वाले ज्ञानी पुरुष है। मेहनत के बल पर धन कमाया । सब कुछ है। संतुष्ट भी है। वे बराबर यह कहा करते थे-जिसके पास सत्-नाम का धन है, वह चाहता है कि अपनी उस सम्पत्ति को सबमें बाँटे ? किन्तु जब पंजाब में साम्प्रदायिक दंगा फैलता है तो वे भी अपने पड़ोसी नूरदीन की गाय लूट कर लाते हैं और पूछने पर कहते हैं अजी लाला, हम न लाते तो कोई और ले जाता । यहाँ हमारा क्या है, सब ‘वाहे गुरु’ का है। इसका दूध भक्तों के काम आयेगा । ज्ञानी जी का यह कथन भगवान के नाम पर लूट-मार-पीट, दंगा करने वाले दो मुंहें चरित्र वालों की पोल खोल कर रख देता है।
उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ की लघुरचनाओं को शिल्प, शैली और कथ्य के आधार पर लघुकथा के रूप में स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। तीसरे दशक से पाँचवें दशक के बीच लिखी गयी रचनाएं अपने तात्कालिक समाज की समस्याओं और देशकाल की स्थिति-परिस्थिति को अपने कथा का उपजीव्य बनाती हैं और हिन्दी लघुकथा को एक-मजबूत आधार प्रदान करती है। अश्क की लघुकथाएँ अपने समकालीनों की लघुकथाओं से ज्यादा चुस्त-दुरुस्त और प्रभावशाली हैं। वैसे इनकी लत्रुकथाओं में कहीं-कहीं हास्य रस भी है किन्तु अधिकतर रचनाएँ समाजिक विसंगतियों और गिरते मानव मूल्यों के विरोध में लिखी गयी है जिसमें लेखक का व्यंग्यात्मक स्वर काफी पैना होकर उभरा है। इसी पैनी धार के कारण ‘अश्क’ जी की ये लघुकथाएँ पाठकों के मध्य समादूत होंगी ।
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