“नमस्ते कर्मबीर जी, कैसे हैं ? सब कुशल मंगल ?” नरेश ने फोन उठाने पर अपने मित्र कर्मबीर से पूछा।
“बस ठीक ही है गुरु जी। आप बताओ कैसे हैं ? कर्मबीर ने अपना हाल बताते हुए प्रश्न किया। वह नरेश को संस्कृत अध्यापक होने के नाते गुरु जी कहता था।
“मैं ठीक हूँ जी; परंतु आपकी आवाज में उदासी झलक रही है। क्या हुआ ? ” नरेश ने फिर प्रश्न किया।
“पिछले दिनों पिताजी का स्वर्गवास हो गया। आज तेरहवीं थी उनकी। आप नहीं पहुँच पाए शायद ?” कर्मबीर ने उदासी का कारण बताते हुए प्रश्न किया।
“क्या ? कैसे हुआ ? क्षमा चाहता हूँ जी लेकिन मेरे पास सूचना नहीं पहुँची। फोन करने में भी देर कर दी दो – तीन दिन पहले कर लेता तो ….। ” नरेश ने पछतावा किया।
“कोई बात नहीं जी। आपके आने से पिताजी पुनर्जीवित तो होने से रहे। वैसे हमने स्टेटस तो लगा दिया था वाट्स एप पर। आप शायद देखते नहीं । ” उसने नए सूचना तंत्र के बारे में मेरी अनभिज्ञता की ओर संकेत किया।
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